
दो लोग ग्यारह साल तक दिन में दो बार ब्रश करते हैं। उनमें से एक के दाँत ज़्यादा बचते हैं। करीब 2,900 बड़ों पर दस साल चली एक स्टडी में इस फर्क का कुछ हिस्सा एक छोटी सी बात से आया — उन्होंने कौन सा ब्रश चुना।
पर तुलना से पहले भारत की ईमानदार बात। यहाँ बहुत लोगों के मुँह की सेहत ब्रश तय नहीं करता। तंबाकू तय करती है।
गुटखा, खैनी, ज़र्दा, पान मसाला और पान का बीड़ा भारतीय मुँहों को उससे कहीं ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं जितना कोई ब्रश करने की आदत सुधार सके। और मुँह का कैंसर भारतीय पुरुषों में सबसे आम कैंसरों में है। अगर आप चबाते हैं, तो उसे छोड़ना इस लेख के सारे सुधारों को जोड़कर भी ज़्यादा कीमती है।
यह कहने के बाद — जो लोग दिन में दो बार ब्रश करते हैं और सोच रहे हैं कि इलेक्ट्रिक ब्रश पैसे लायक है या नहीं, उनके लिए सबूत यह कहते हैं।
एक नज़र में
प्लाक हटाने और मसूड़ों की सेहत में इलेक्ट्रिक ब्रश मैनुअल से थोड़ा बेहतर है, और यह बढ़त असली है। पर फर्क मामूली है। सही तरीके से दो मिनट, दिन में दो बार चलाया गया मैनुअल ब्रश दाँत और मसूड़े ठीक रखता है।
आपका तरीका, आपका समय और आपकी नियमितता मोटर से ज़्यादा मायने रखते हैं। जो लोग इलेक्ट्रिक ब्रश से भी गलत तरीके से ब्रश करते हैं, उन्हें दो मिनट और सही कोण से ज़्यादा फायदा होगा, मशीन से नहीं।
भारत में कीमत का फर्क उससे कहीं बड़ा है जितना विदेशी लेख मानकर चलते हैं। मैनुअल ब्रश बहुत सस्ता है। अच्छे इलेक्ट्रिक हैंडल हज़ारों रुपये के आते हैं, और असली खर्च बदलने वाले हेड का है, जो बड़े शहरों के बाहर आसानी से मिलते भी नहीं।
यहाँ दो चीज़ें ब्रश से ज़्यादा मायने रखती हैं। किसी भी रूप में तंबाकू छोड़ना, और फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट इस्तेमाल करना। इनमें से कोई खरीदारी नहीं है।

टूथब्रश मायने क्यों रखता है
आपका टूथब्रश प्लाक के खिलाफ पहली दीवार है। प्लाक बैक्टीरिया की वह चिपचिपी परत है जो दाँतों पर और मसूड़ों की किनार पर लगातार बनती रहती है।
इसे जमा रहने दिया जाए तो कीड़ा लगता है, मसूड़ों में सूजन होती है, फिर पीरियोडोंटाइटिस, मुँह की बदबू, और आखिर में दाँत गिरते हैं। और प्लाक एक बार सख्त होकर टार्टर बन जाए, तो उसे सिर्फ डेंटिस्ट या हाइजीनिस्ट ही हटा सकता है।
भारत में यह आंकड़ों से भी ज़्यादा मायने रखता है, क्योंकि यहाँ इलाज का खर्च ज़्यादातर जेब से जाता है और डेंटिस्ट शहरों में सिमटे हैं। एक फिलिंग बचाना पैसे और एक सफर दोनों की बचत है। जहाँ इलाज तक पहुँचना मुश्किल हो, वहाँ बचाव और कीमती हो जाता है।
मैनुअल टूथब्रश
पुराना वाला ब्रश — एक हैंडल, एक हेड, और हरकत आपका हाथ देता है।
यह सस्ता है और हर किराना दुकान व केमिस्ट पर मिलता है। चार्ज नहीं करना पड़ता, कहीं भी ले जाया जा सकता है, हर आकार और ब्रिसल में आता है, और दबाव पूरी तरह आपके हाथ में रहता है।
इसकी कमज़ोरी यह है कि यह पूरी तरह तरीके पर टिका है। जगहें छूट जाना आसान है, जिनके हाथ कम चलते हैं उनके लिए मुश्किल है, और ज़्यादातर लोग दो मिनट से काफी कम ब्रश करते हैं।
सही तरीके से, नरम ब्रिसल वाले हेड और मॉडिफाइड बास तकनीक के साथ, यह मुँह की बेहतरीन सेहत देता है।
और दातुन के बारे में एक बात
नीम और बबूल की दातुन भारत के बड़े हिस्से में आज भी चलती है, और वह बेकार नहीं है। नीम में सचमुच बैक्टीरिया रोकने वाले गुण हैं, और चबाई हुई दातुन सफाई करती भी है।
पर यह ब्रश और फ्लोराइड टूथपेस्ट के बराबर नहीं है। दातुन मसूड़ों की किनार तक भरोसे से नहीं पहुँच पाती, इसके रेशे इतने खुरदरे होते हैं कि सालों में मसूड़े और इनैमल घिसा सकते हैं, और इसमें फ्लोराइड बिल्कुल नहीं होता। शौक से इस्तेमाल कीजिए, पर साथ में फ्लोराइड टूथपेस्ट और नरम ब्रश भी, उनकी जगह नहीं।
इलेक्ट्रिक टूथब्रश
पावर वाला ब्रश हेड को खुद हिलाता है। या तो घूमकर और आगे-पीछे होकर, जिसमें छोटा गोल हेड दोनों तरफ घूमता है। या बहुत तेज़ रफ्तार वाले सोनिक कंपन से।
भारत में ये इलेक्ट्रिक, पावर या ऑटोमैटिक टूथब्रश के नाम से बिकते हैं। ये एक ही श्रेणी हैं और रिसर्च सब पर लागू होती है।
ज़्यादातर में टाइमर, प्रेशर सेंसर, कई मोड, ऐप कनेक्शन और हेड बदलने की याद दिलाने वाली सुविधा होती है। इनमें से दो ही लगभग पूरा काम करते हैं — टाइमर और प्रेशर सेंसर। बाकी सुविधा है, जिसके आप पैसे दे रहे हैं।
रिसर्च असल में क्या कहती है
बचाव वाली डेंटिस्ट्री में यह सबसे ज़्यादा पढ़े गए सवालों में है।
सबसे बड़ी समीक्षा 51 ट्रायल और 4,624 लोगों पर हुआ कोक्रेन विश्लेषण है। उसमें पावर ब्रश ने एक से तीन महीने में 11% ज़्यादा प्लाक हटाया, और तीन महीने बाद 21% ज़्यादा। इसी दौर में मसूड़ों की सूजन 6% और 11% कम रही। सबूत की गुणवत्ता मध्यम आँकी गई।
वजह मशीनी है। पावर ब्रश एक मिनट में हज़ारों हरकतें करता है, इसलिए आपके तरीके पर कम निर्भरता रहती है। आप उसे धीरे-धीरे मुँह में घुमाते हैं, हरकत खुद पैदा नहीं करते।
इससे यह साबित नहीं होता कि मैनुअल ब्रश बेअसर हैं। नरम मैनुअल ब्रश से दो मिनट, दिन में दो बार, ध्यान से ब्रश करने वाला आदमी बेहतरीन नतीजे पाता है।
वह लंबी स्टडी, जो असल में मायने रखती है
ज़्यादातर ट्रायल कुछ हफ्ते चलते हैं। और आज कम प्लाक होने से यह साबित नहीं होता कि बीस साल बाद दाँत बचेंगे। जर्मनी की एक स्टडी ने 2,819 बड़ों को ग्यारह साल तक देखा और यही कमी पूरी की।
पावर ब्रश इस्तेमाल करने वालों में मसूड़ों की जेब गहरी होने की रफ्तार 22% कम मिली, कीड़ा बढ़ने की रफ्तार करीब 18% कम, और उनके करीब 0.36 दाँत ज़्यादा बचे।
नई समीक्षाएँ भी उसी दिशा में हैं। 2024 की एक समीक्षा में यह बढ़त 55 पार के लोगों में भी टिकी, और 2025 के एक मेटा-विश्लेषण में बच्चों में। ढर्रा एक जैसा है। हाथ से अच्छा ब्रश करना जितना मुश्किल हो, पावर ब्रश उतना ही ज़्यादा काम का है।
मसूड़ों की सेहत, जहाँ भारत की दिक्कत बड़ी है
मसूड़ों की बीमारी उसी किनार से शुरू होती है जहाँ प्लाक सबसे पहले बैठता है। भारतीय बड़ों में मसूड़ों की बीमारी बहुत आम है, और यह आमतौर पर बिना दर्द के आती है। इसीलिए दाँत हिलने तक किसी को पता नहीं चलता।
पावर ब्रश इसलिए मदद करता है कि वह उसी किनार पर लगातार एक जैसी हरकत और दबाव बनाए रखता है। प्रेशर सेंसर भी मायने रखता है, क्योंकि ज़ोर से ब्रश करने से मसूड़े पीछे हटते हैं, दाँत सिनसिनाते हैं और इनैमल घिसता है। और पीछे हटे मसूड़े दोबारा नहीं उगते।
मसूड़ों की शुरुआती सूजन और शुरुआती बीमारी में किनार की बेहतर सफाई ही सूजन पलटती है, और पावर ब्रश इसे रोज़ करना आसान बना देता है। यह अपने आप में इलाज नहीं है। जम चुकी मसूड़ों की बीमारी के लिए डेंटिस्ट चाहिए।
भारत में इसका खर्च क्या है
यहीं इस तुलना का विदेशी संस्करण काम का नहीं रह जाता।
| मैनुअल टूथब्रश | इलेक्ट्रिक टूथब्रश | |
|---|---|---|
| कहाँ मिलता है | कोई भी केमिस्ट, किराना या सुपरमार्केट | ऑनलाइन, या शहरों की बड़ी दुकानों में |
| हैंडल | बहुत सस्ता | अच्छे के लिए कई हज़ार रुपये |
| बार-बार का खर्च | हर तीन महीने में नया ब्रश | हर तीन महीने में बदलने वाला हेड, और वे सस्ते नहीं |
| रिफिल की उपलब्धता | हर जगह | ज़्यादातर ऑनलाइन, शहरों के बाहर मुश्किल |
| चार्जिंग | कुछ नहीं | सॉकेट चाहिए, और बिजली कटने वाले इलाकों में यह मायने रखता है |
| सफर | बढ़िया | अलग चार्जर, ज़्यादा सामान |

असली खर्च हैंडल नहीं, बदलने वाले हेड हैं। और यही बात खरीदते वक्त ज़्यादातर लोग चूक जाते हैं। जिस ब्रश के हेड आप आसानी से नहीं खरीद सकते, वह बैटरी लगा मैनुअल ब्रश बन जाता है।
और टाइमर व प्रेशर सेंसर वाला मंझोली कीमत का ब्रश लगभग पूरा नापा हुआ फायदा दे देता है। सबूत पावर ब्रशिंग की पूरी श्रेणी के लिए हैं, किसी महँगे मॉडल के लिए नहीं। ज़्यादा पैसा ऐप कनेक्शन और अतिरिक्त मोड खरीदता है, बेहतर मसूड़े नहीं।
कीमत में जीत साफ तौर पर मैनुअल ब्रश की है।
तो क्या यह पैसे लायक है?
कुछ लोगों के लिए हाँ। कुछ के लिए यह गलत जगह खर्च है।
इलेक्ट्रिक ब्रश लीजिए अगर: प्लाक काबू में नहीं रहता, मसूड़ों में सूजन या शुरुआती बीमारी है, तार लगे हैं, या गठिया है और हाथ कम चलते हैं। या अगर आप जानते हैं कि आप दो मिनट से काफी कम ब्रश करते हैं और टाइमर से यह बदल जाएगा।
मैनुअल ब्रश पर टिके रहिए अगर: आपका तरीका ठीक है, आप पूरे दो मिनट ब्रश करते हैं, और आपके डेंटिस्ट को मसूड़े ठीक लगते हैं। या अगर वह पैसा उस डेंटल चेकअप पर लगना चाहिए जिसे आप टालते आ रहे हैं।
आखिरी वाली बात ही ईमानदार भारतीय जवाब है। अगर बजट तय है, तो डेंटिस्ट के यहाँ स्केलिंग और एक चेकअप आमतौर पर आपके मुँह के लिए पावर ब्रश से ज़्यादा करेगा।
टूथपेस्ट ब्रश से ज़्यादा मायने रखता है, और उस पर दो भारतीय बातें
फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट इस्तेमाल कीजिए। पूरी डेंटिस्ट्री में सबसे मजबूत सबूत इसी हिस्से के हैं, और यह इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि उसे कौन सा ब्रश इधर-उधर करता है।
भारत में हर्बल और चारकोल टूथपेस्ट की जमकर मार्केटिंग होती है। इनमें से कई में फ्लोराइड होता ही नहीं। चारकोल वाले पेस्ट खुरदरे होते हैं और वक्त के साथ इनैमल घिसा सकते हैं। और जो सफेदी वे वादा करते हैं, वह ज़्यादातर ऊपरी दाग हटना भर है। खरीदने से पहले डिब्बे पर फ्लोराइड देख लीजिए।
⚠️ और एक बात जो भारत के कुछ हिस्सों की अपनी है — फ्लोरोसिस। कुछ ज़िलों के भूजल में फ्लोराइड कुदरती तौर पर ज़्यादा है। इनमें राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु के इलाके आते हैं।
वहाँ बच्चों को सिर्फ पीने के पानी से ही ज़रूरत से ज़्यादा फ्लोराइड मिल सकता है। यह पक्के दाँतों पर सफेद या भूरे धब्बों की शक्ल में दिखता है।
ऐसे इलाके में तीन बातें रखिए। बच्चे के लिए मटर के दाने जितना ही पेस्ट लीजिए। उसे निगलने के बजाय थूकना सिखाइए। और डेंटिस्ट से पूछिए कि आपका पानी चिंता की बात है या नहीं।
इसका मतलब फ्लोराइड टूथपेस्ट छोड़ना नहीं है। मतलब यह है कि पानी से जो पहले से मिल रहा है, उस पर निगला हुआ अतिरिक्त फ्लोराइड न चढ़े।
बच्चे और तार वाले दाँत
बच्चे बहुत कम समय ब्रश करते हैं और कई सतहें छोड़ देते हैं। इलेक्ट्रिक ब्रश मदद करता है, क्योंकि टाइमर समय पूरा कराता है, हरकत ज़्यादा काम खुद कर देती है, और जो ब्रश बच्चे को अच्छा लगता है वही वह इस्तेमाल करता है।
निगरानी में चलाया गया नरम मैनुअल ब्रश भी पूरी तरह काम करता है। असली दवा निगरानी है, मोटर नहीं।
तार लगे होने पर बहुत सी और सतहें बन जाती हैं जहाँ प्लाक जमता है, और इसीलिए ऑर्थोडॉन्टिस्ट अक्सर पावर ब्रश की सलाह देते हैं। जो भी लीजिए, नरम ब्रिसल वाला हेड लीजिए, क्योंकि ब्रैकेट के आसपास मसूड़े पहले से चिढ़े होते हैं।
वे गलतियाँ जो कोई ब्रश ठीक नहीं कर सकता
दो मिनट से कम ब्रश करना। बहुत ज़ोर लगाना। मसूड़ों की किनार बिल्कुल छोड़ देना। फैले हुए ब्रिसल वाला ब्रश साल भर चलाना।
और सबसे बड़ी — यह मान लेना कि ब्रश दाँतों के बीच भी साफ कर देता है। नहीं करता। ब्रश करना और दाँतों के बीच सफाई करना दो अलग काम हैं, और ब्रश उनमें से एक ही करता है।
ब्रश कब बदलें
सफाई ब्रिसल करते हैं, और वे घिस जाते हैं। मैनुअल ब्रश या इलेक्ट्रिक हेड हर तीन से चार महीने में बदलिए, और ब्रिसल पहले फैल जाएँ तो उससे भी पहले।
घिसा हुआ ब्रश इलेक्ट्रिक की पूरी बढ़त खत्म कर देता है। तीन महीने पुराना मैनुअल ब्रश साल भर पुराने इलेक्ट्रिक से हमेशा बेहतर सफाई करेगा।
| आप क्या बदल रहे हैं | कितनी बार | क्यों |
|---|---|---|
| मैनुअल टूथब्रश | हर 3-4 महीने | ब्रिसल नरम होकर फैल जाते हैं और प्लाक उठाना बंद कर देते हैं |
| इलेक्ट्रिक ब्रश का हेड | हर 3 महीने | छोटे ब्रिसल पावर वाली हरकत में तेज़ी से घिसते हैं |
| फैले ब्रिसल वाला कोई भी ब्रश | तुरंत | फैले ब्रिसल मसूड़ों की किनार में जाने के बजाय ऊपर से फिसल जाते हैं |
| सर्दी, फ्लू या गले के इन्फेक्शन के बाद | तुरंत | ठीक होते समय की समझदारी भरी सावधानी |
| बच्चों के ब्रश | हर 3 महीने या पहले | बच्चे ज़्यादा ज़ोर लगाते हैं और ब्रिसल चबा जाते हैं |
कैलेंडर नहीं, ब्रश देखिए। जो ब्रिसल फैल चुके हैं, वे अपनी सफाई की ज़्यादातर ताकत पहले ही खो चुके हैं।
एक चीज़ जो कोई टूथब्रश नहीं कर सकता
ब्रश करना आधी कहानी है। एक रैंडमाइज़्ड ट्रायल में मसूड़ों की सूजन वाले जिन लोगों ने ज़्यादा रेशा, विटामिन C, एंटीऑक्सिडेंट और पौधों वाला नाइट्रेट खाया, उनमें चार हफ्ते बाद मसूड़ों से खून आना काफी घट गया। जबकि उनका प्लाक लगभग जितना था उतना ही रहा।
भारतीय थाली के लिए इसका मतलब है — ज़्यादा सब्जी, फल और मोटा अनाज, और कम मैदा, चीनी व तली चीज़ें। वही बदलाव जो बाकी सब चीज़ों में मदद करते हैं।
निचोड़
ज़्यादातर लोगों के लिए इलेक्ट्रिक टूथब्रश थोड़ा बेहतर है, क्योंकि यह अच्छा ब्रश करना रोज़ निभाना आसान बना देता है। सही तरीके से चलाया गया मैनुअल ब्रश आज भी बेहतरीन है।
भारत में तीन चीज़ें इस पूरे सवाल से ऊपर हैं — तंबाकू छोड़ना, फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट इस्तेमाल करना, और दर्द होने से पहले डेंटिस्ट को दिखाना।
सबसे अच्छा टूथब्रश सबसे महँगा वाला नहीं है। वह है जिसे आप सही तरीके से, हल्के हाथ से, दिन में दो बार चलाते हैं।
खास बातें
इलेक्ट्रिक ब्रश थोड़ा ज़्यादा प्लाक हटाते हैं और मसूड़े थोड़े बेहतर रखते हैं। यह बढ़त सबसे ज़्यादा बच्चों, बुज़ुर्गों, तार लगे लोगों और कम हाथ चलने वालों के लिए है।
सही तरीके से दो मिनट चलाया गया मैनुअल ब्रश दाँत और मसूड़े ठीक रखता है। तरीका मोटर से ज़्यादा मायने रखता है।
भारत में बार-बार का खर्च हैंडल नहीं, बदलने वाला हेड है, और रिफिल बड़े शहरों के बाहर मुश्किल से मिलते हैं। टाइमर और प्रेशर सेंसर वाला मंझोला ब्रश लगभग पूरा फायदा दे देता है।
फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट लीजिए और डिब्बा देखकर लीजिए, क्योंकि यहाँ बिकने वाले कई हर्बल और चारकोल पेस्ट में फ्लोराइड होता ही नहीं, और चारकोल खुरदरा होता है। फ्लोरोसिस वाले ज़िलों में बच्चों के लिए मटर के दाने जितना पेस्ट रखिए और थूकना सिखाइए।
कोई ब्रश तंबाकू की भरपाई नहीं करता। गुटखा, खैनी, ज़र्दा और पान का बीड़ा भारतीय मुँहों के लिए सबसे बड़ा अकेला खतरा हैं, और उन्हें छोड़ना इस लेख के किसी भी उपकरण से ज़्यादा कीमती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या भारत में इलेक्ट्रिक टूथब्रश खरीदना ठीक रहेगा?
यह इस पर है कि आपका पैसा कहाँ सबसे काम आएगा। अगर प्लाक काबू में नहीं रहता, मसूड़ों की बीमारी है, तार लगे हैं, या हाथ कम चलते हैं, तो हाँ। और अगर तरीका ठीक है और आप डेंटल चेकअप टालते आ रहे हैं, तो चेकअप बेहतर खरीदारी है।
2. क्या बदलने वाले हेड आसानी से मिल जाते हैं?
ज़्यादातर ऑनलाइन, और बड़े शहरों के बाहर कम आसानी से। यह हैंडल की कीमत से ज़्यादा मायने रखता है, क्योंकि जिस ब्रश के हेड आप हर तीन महीने में नहीं बदल सकते, वह कोई बढ़त देना बंद कर देता है।
3. क्या दातुन टूथब्रश जितनी अच्छी है?
उसकी जगह लेने लायक नहीं। नीम में सचमुच बैक्टीरिया रोकने वाले गुण हैं, पर दातुन मसूड़ों की किनार भरोसे से साफ नहीं कर पाती, सालों में मसूड़े और इनैमल घिसा सकती है, और उसमें फ्लोराइड नहीं होता। पसंद हो तो नरम ब्रश और फ्लोराइड टूथपेस्ट के साथ चलाइए, उनकी जगह नहीं।
4. क्या हर्बल या चारकोल टूथपेस्ट बेहतर होते हैं?
आमतौर पर नहीं। इनमें से कई में फ्लोराइड होता ही नहीं, जो डेंटिस्ट्री का सबसे मजबूत सबूत वाला तत्व है। और चारकोल इतना खुरदरा होता है कि वक्त के साथ इनैमल घिसा दे। खरीदने से पहले डिब्बे पर फ्लोराइड देख लीजिए।
5. हमारे पानी में फ्लोराइड ज़्यादा है। क्या फ्लोराइड टूथपेस्ट छोड़ दें?
अपने आप मत छोड़िए, डेंटिस्ट से पूछिए। फ्लोरोसिस वाले ज़िलों में आम सलाह यही होती है कि बच्चे के लिए मटर के दाने जितना पेस्ट लें, उसे थूकना सिखाएँ, और अतिरिक्त फ्लोराइड सप्लीमेंट से बचें। सावधानी टूथपेस्ट को लेकर नहीं, उसके ऊपर पड़ने वाले अतिरिक्त फ्लोराइड को लेकर है।
6. क्या ज़ोर से ब्रश करने से बेहतर सफाई होती है?
नहीं, और इससे नुकसान होता है। लगातार भारी दबाव से मसूड़े की किनार पीछे हट जाती है, और पीछे हटे मसूड़े दोबारा नहीं उगते। ब्रिसल को मसूड़ों की किनार की तरफ झुकाइए और काम ब्रश को करने दीजिए।
7. क्या फिर भी दाँतों के बीच सफाई करनी पड़ेगी?
हाँ। किसी भी तरह का टूथब्रश दाँतों के बीच ठीक से नहीं पहुँचता। फ्लॉस या इंटरडेंटल ब्रश वह काम करते हैं जो ब्रश नहीं कर सकता। और मसूड़ों की बीमारी आमतौर पर ठीक वहीं से शुरू होती है जहाँ ब्रश नहीं पहुँचता।
8. क्या महँगा इलेक्ट्रिक ब्रश सस्ते से बेहतर होता है?
ख़ास नहीं। सबूत पावर ब्रशिंग की पूरी श्रेणी के लिए हैं। दो मिनट का टाइमर और प्रेशर सेंसर वाला मॉडल लगभग पूरा नापा हुआ फायदा दे देता है।
शब्दावली
ऑसिलेटिंग-रोटेटिंग: वह इलेक्ट्रिक ब्रश जिसका छोटा गोल हेड आगे-पीछे घूमता है।
सोनिक टूथब्रश: वह इलेक्ट्रिक ब्रश जो घूमने के बजाय बहुत तेज़ कंपन से सफाई करता है।
जिंजिवाइटिस: मसूड़ों की शुरुआती सूजन, जो पलटी जा सकती है।
डेंटल फ्लोरोसिस: दाँतों के इनैमल पर पड़ने वाले धब्बे, जो पक्के दाँत बनते समय ज़रूरत से ज़्यादा फ्लोराइड मिलने से होते हैं।
संदर्भ
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- Woelber JP, et al. The influence of an anti-inflammatory diet on gingivitis: a randomised controlled trial. Journal of Clinical Periodontology. 2019.
अस्वीकरण
यह लेख सिर्फ आम जानकारी के लिए है और ऐसे योग्य डेंटिस्ट की सलाह की जगह नहीं लेता जो आपकी हिस्ट्री जानता हो। मसूड़ों से खून आए, लगातार दर्द रहे, दाँत हिलें, या मुँह में कोई न भरने वाला घाव या छाला हो, तो जल्दी डेंटिस्ट को दिखाइए।