अच्छी सेहत, हमारे अपने हाथों में है।

हर उम्र के लिए पूरी मुँह देखभाल गाइड: कैविटी, मसूड़ों की बीमारी और दाँतों के नुकसान से बचाव

मुँह की सफाई

भारत में अब लगभग हर आदमी दिन में दो बार ब्रश करता है। और दाँतों के बीच सफाई लगभग कोई नहीं करता। यही एक कमी वह ज़्यादातर चीज़ें समझा देती है जो यहाँ का डेंटिस्ट रोज़ देखता है।

भारत में मुँह की बीमारी लापरवाही की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे रूटीन की कहानी है जो आधे रास्ते रुक जाता है।

और उसके साथ दो चीज़ें, जो बाकी दुनिया इस मात्रा में नहीं ढोती। हर रूप में तंबाकू, और वह पीने का पानी जिसमें कई ज़िलों में पहले से ज़रूरत से ज़्यादा फ्लोराइड है।

यह गाइड पूरा रूटीन है, उम्र के हिसाब से, और जो हिस्से यहाँ अलग हैं उन्हें अलग की तरह ही लिखा गया है, अनुवाद की तरह नहीं।

एक नज़र में

चार आदतें लगभग पूरा काम कर देती हैं। दिन में दो बार, दो-दो मिनट, फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश। दिन में एक बार दाँतों के बीच सफाई। मीठा दिन भर नहीं, खाने के साथ। और साल में एक बार डेंटिस्ट। इसे लगातार करना, कभी-कभी बहुत मेहनत से करने से बेहतर है।

दाँतों की लगभग हर दिक्कत प्लाक से शुरू होती है। उसे 24 से 72 घंटे छोड़ दीजिए तो वह सख्त होकर टार्टर बन जाता है, और फिर उसे कोई टूथब्रश नहीं हटाता। वही वह मोड़ है जहाँ कीड़ा और मसूड़ों की बीमारी मुमकिन होने से आगे बढ़कर संभावित हो जाते हैं।

दो चीज़ें यहाँ बाकी दुनिया से ज़्यादा मायने रखती हैं। किसी भी रूप में तंबाकू भारत में मुँह की गंभीर बीमारी की सबसे बड़ी अकेली वजह है, जिसमें मुँह का कैंसर भी शामिल है। और फ्लोरोसिस वाले ज़िलों में पानी पहले से ज़्यादा फ्लोराइड ला रहा है, जिससे बच्चों के लिए फ्लोराइड की सलाह बदल जाती है।

अच्छी सफाई का मतलब उम्र के साथ बदलता है। बच्चे के मसूड़े पोंछती माँ, किशोर के तारों के आसपास मदद, बुढ़ापे में दवाओं से सूखता मुँह। सिद्धांत वही रहता है, तरीका नहीं।

मसूड़ों से खून आना, न जाने वाली बदबू, दाँतों का सिनसिनाना, या चबाने पर दर्द — ये सब डेंटिस्ट को दिखाने की वजहें हैं, इंतज़ार करने की नहीं। इनमें से कोई अपने आप ठीक नहीं होती।

मुँह की सफाई

यह भारत के लिहाज़ से क्यों मायने रखता है

WHO के अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब साढ़े तीन अरब लोग मुँह की किसी बीमारी से जूझते हैं। इसमें भारत का हिस्सा बड़ा है, और उसके दो हिस्से खास तौर पर हमारे हैं।

मसूड़ों की बीमारी बहुत आम है और लगभग हमेशा देर से पकड़ी जाती है, क्योंकि उसके शुरुआती दौर में दर्द नहीं होता। लोग तब आते हैं जब दाँत हिलने लगता है, यानी उस मोड़ के सालों बाद जहाँ वह एक स्केलिंग की कीमत पर पलट सकती थी।

मुँह के कैंसर का जितना बोझ भारत ढोता है, उतना दुनिया में कम जगह है। इसकी वजह गुटखा, खैनी, ज़र्दा, पान मसाला और सिगरेट हैं। यह उन गिने-चुने कैंसरों में है जिन्हें आदमी को आईने में दिखाया जा सकता है, और फिर भी यह आमतौर पर देर से पकड़ा जाता है।

इसमें व्यावहारिक परत जोड़िए — यहाँ लगभग हर जगह दाँतों के इलाज का खर्च जेब से जाता है। स्केलिंग सस्ती है। रूट कैनाल और क्राउन सस्ते नहीं। इम्प्लांट तो बिल्कुल अलग स्तर का पैसा है। यहाँ बचाव सद्गुण नहीं, हिसाब है।

मुँह की सफाई वाली सीरीज़

यह गाइड भाग 1 है। नीचे का हर हिस्सा रूटीन का एक टुकड़ा उठाकर उसे ठीक से बताता है।

  1. हर उम्र के लिए मुँह की सफाई की पूरी गाइड। यही आप पढ़ रहे हैं।
  2. ब्रश करने का तरीका — बास, मॉडिफाइड बास और फोन्स। कौन सा तरीका किस मुँह पर, और दो मिनट असल में कितने लंबे होते हैं।
  3. इलेक्ट्रिक या मैनुअल टूथब्रश। सबूत क्या कहते हैं, और यहाँ कीमत का फर्क उसके लायक है या नहीं।
  4. दाँतों के बीच सफाई। फ्लॉस, इंटरडेंटल ब्रश, और टूथपिक विकल्प क्यों नहीं है।
  5. टॉन्सिल स्टोन के लिए वॉटर फ्लॉसर। कितना दबाव सुरक्षित है, और वह सस्ता तरीका जो ज़्यादातर लोगों को पहले आज़माना चाहिए।
  6. इंटरडेंटल ब्रश और खून आते मसूड़े। सही नाप चुनना, और खून आमतौर पर दो हफ्ते में क्यों बंद हो जाता है।

रोज़ का रूटीन

दिन में दो बार, दो-दो मिनट, फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश। दिन में एक बार दाँतों के बीच सफाई। जीभ साफ। मीठा खाने के साथ। पर्याप्त पानी। और साल में एक बार डेंटिस्ट।

लगातार करना ज़ोर लगाने से ज़्यादा मायने रखता है। रोज़ के रूटीन का पूरा मकसद यह है कि प्लाक सख्त होने से पहले टूट जाए, और यह मेहनत की नहीं, नियमितता की बात है।

एक भारतीय आदत रखने लायक है और एक छोड़ने लायक। जीभी ज़्यादातर भारतीय बाथरूम में पहले से है, और यह इस सूची की सबसे काम की चीज़ों में है। खाने के बाद वाली टूथपिक छोड़ने लायक है, और उसी जेब में इंटरडेंटल ब्रश रखा जा सकता है।

उम्र के हिसाब से — कब क्या बदलता है

दूध पीते बच्चे, 0 से 3 साल

पहला दाँत आने से पहले ही मुँह साफ करना शुरू कीजिए — उँगली पर साफ नरम कपड़ा लपेटकर, दिन में एक बार।

दाँत आ जाएँ तो नरम बेबी ब्रश और चावल के दाने जितना फ्लोराइड टूथपेस्ट लीजिए।

इस उम्र में भारत की सबसे बड़ी टाली जा सकने वाली दिक्कत रात की बोतल है। दूध, और उससे भी बुरा, मीठा दूध या जूस, सोते समय मुँह में छूट जाए तो बचपन में ही कीड़ा लगता है। यह आम है, दर्दनाक है, और अक्सर तीन साल के बच्चे के दाँत बेहोश करके निकालने पर खत्म होता है।

यहाँ खिलाने के तरीके इसे और खास बना देते हैं। उँगली पर शहद, गुड़ या चीनी, रात को बोतल में मीठा दूध, और पहले जन्मदिन के बाद भी बोतल चलते रहना — ये सब एक ही दिक्कत को खिलाते हैं। एक साल के बाद गिलास पर आ जाइए।

बच्चे, 3 से 12 साल

दिन में दो बार फ्लोराइड टूथपेस्ट से ब्रश, और तब तक निगरानी में जब तक बच्चा साफ लिखने न लगे। लगभग उसी समय हाथ का काबू इतना हो जाता है।

फ्लोराइड पर यहाँ स्थानीय फैसला चाहिए। भारत के ज़्यादातर हिस्सों में बच्चों को फ्लोराइड टूथपेस्ट चाहिए। फ्लोरोसिस वाले ज़िलों में बात बदल जाती है।

वहाँ भूजल में पहले से ज़्यादा फ्लोराइड है, इसलिए मटर के दाने जितना पेस्ट और निगलने के बजाय थूकने वाला बच्चा और ज़्यादा मायने रखता है। अगर आपको पता है कि आपके इलाके के पानी में फ्लोराइड की दिक्कत है, तो डेंटिस्ट को बताइए।

पहली पक्की दाढ़ों पर पिट और फिशर सीलेंट सस्ते हैं, जल्दी लगते हैं, और दाँतों के सबसे कीमती इलाजों में हैं। छह साल वाली दाढ़ें आते ही इनके बारे में पूछिए।

पीछे के दाँत आपस में छूने लगें, तभी से दाँतों के बीच सफाई शुरू कीजिए।

किशोर, 13 से 19 साल

दो मिनट, दिन में दो बार, और रोज़ दाँतों के बीच सफाई।

भारतीय किशोरों में तार लगवाना लगातार आम होता जा रहा है, और उससे रूटीन पूरी तरह बदल जाता है। इंटरडेंटल ब्रश, और कुछ के लिए वॉटर फ्लॉसर, विकल्प नहीं, ज़रूरत बन जाते हैं।

भारत में तंबाकू इसी उम्र में शुरू होती है, अक्सर दोस्तों के बीच बँटते गुटखा या पान मसाला के रूप में, जिसे तंबाकू माना ही नहीं जाता। घर में इस पर सीधी बात करने लायक है, क्योंकि भारत में तंबाकू लेने वाले लगभग हर बड़े आदमी ने बीस से पहले शुरू किया था।

मीठे ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक, और इम्तिहान के महीनों में लगातार कुछ न कुछ खाते रहना — ये किसी एक मिठाई से ज़्यादा मायने रखते हैं।

बड़े, 20 से 60 साल

ठीक से ब्रश, रोज़ दाँतों के बीच सफाई, और हर तीन महीने में ब्रश या हेड बदलना।

साल में एक बार दाँतों की स्केलिंग कराइए। भारत के ज़्यादातर बड़ों ने यह कभी नहीं कराई, और यही वह मुलाकात है जो मसूड़ों की बीमारी को पलटने लायक दौर में पकड़ लेती है।

दाँत पीसने पर नज़र रखिए, जो घिसे दाँतों और सुबह जबड़े के दर्द से दिखता है। गर्भावस्था में मसूड़ों के बदलाव पर भी। और अगर आप तंबाकू लेते हैं, तो गाल, जीभ या तालू पर किसी भी अनोखी चीज़ पर।

60 के बाद

दिक्कतें बदल जाती हैं — दवाओं से सूखता मुँह, खुली जड़ों पर कीड़ा, दशकों से चुपचाप चलती मसूड़ों की बीमारी, और नकली दाँतों की परेशानी।

हाथ अकड़ जाएँ तो नरम ब्रश या पावर ब्रश मदद करता है। नकली दाँत रोज़ साफ करने चाहिए और रात को निकालने चाहिए। सूखे मुँह के लिए पानी, बिना चीनी वाली चबाने की चीज़, और डॉक्टर से उन दवाओं की समीक्षा चाहिए जिनसे यह हो रहा है।

मुँह के कैंसर की जाँच इसी समूह में सबसे ज़्यादा मायने रखती है, खासकर उनमें जिन्होंने तंबाकू ली हो। डेंटिस्ट की मुलाकात में इसमें दो मिनट लगते हैं, और यही शुरुआती और देर से पकड़े गए घाव के बीच का फर्क है।

प्लाक और टार्टर — 72 घंटे की घड़ी

प्लाक बैक्टीरिया, लार के प्रोटीन और खाने के कचरे की नरम परत है। ब्रश करने के कुछ घंटे बाद ही आप इसे जीभ से महसूस कर सकते हैं। यह लगातार बनती रहती है, और इसीलिए ब्रश करना रोज़ का काम है।

जब तक यह नरम है, ब्रश और इंटरडेंटल ब्रश इसे पूरी तरह हटा देते हैं। छोड़ दीजिए तो लार के खनिज इसे सख्त करके कैल्कुलस बना देते हैं — वही खुरदुरा पीला-भूरा जमाव जिसे ज़्यादातर लोग टार्टर कहते हैं।

एक बार यह सख्त हो जाए तो घर पर आप कुछ भी करें, यह नहीं हटता। इसे सिर्फ डेंटिस्ट की स्केलिंग हटाती है। और उसकी खुरदुरी सतह पर नया प्लाक चिकने इनैमल से भी तेज़ जमता है, यानी रफ्तार और बढ़ जाती है।

यह सबसे पहले नीचे के आगे के दाँतों के पीछे जमता है। फिर ऊपर की पिछली दाढ़ों की बाहरी सतह पर, मसूड़े की किनार के साथ, और दाँतों के बीच जहाँ ब्रश कभी नहीं पहुँचता।

एक आसान जाँच — प्लाक नरम और हल्के रंग का होता है और ब्रश से निकल जाता है। टार्टर सख्त, खुरदुरा और आमतौर पर पीला या भूरा होता है और नहीं निकलता। अगर आपको ऐसा जमाव दिखे जो ब्रश से नहीं जाता, तो वह टार्टर है, और उसके लिए ज़्यादा तेज़ टूथपेस्ट नहीं, एक अपॉइंटमेंट चाहिए।

ब्रश करने का तरीका

तरीका ब्रश से ज़्यादा मायने रखता है।

बास तकनीक

मसूड़े की किनार की सफाई का मानक तरीका। ब्रश को मसूड़े से 45 डिग्री पर पकड़िए, छोटी-छोटी हल्की कंपन वाली हरकतें कीजिए, और ब्रिसल की नोकें दाँत और मसूड़े के बीच की दरार में ज़रा-सी बैठने दीजिए।

मॉडिफाइड बास

वही तरीका, और उसके बाद मसूड़े से दूर की तरफ एक झाड़ू जैसी हरकत। सफाई थोड़ी बेहतर और ज़्यादातर लोगों के लिए निभाना आसान।

फोन्स तकनीक

सादे गोल-गोल घेरे। छोटे बच्चों को यही सिखाया जाता है, क्योंकि यह सीखना आसान है, इसलिए नहीं कि यह सबसे असरदार है।

स्टिलमैन तकनीक

पीछे हटे मसूड़ों के लिए, जिसमें ब्रिसल का कुछ हिस्सा मसूड़े पर और कुछ दाँत पर टिकता है।

चार्टर तकनीक

तारों के लिए और मसूड़ों की सर्जरी के बाद, जिसमें ब्रिसल चबाने वाली सतह की तरफ मुड़े होते हैं।

दो आदतें छोड़ने लायक। ज़ोर से आगे-पीछे रगड़ना मसूड़े की किनार पर खाँचे बना देता है, और भारतीय बड़ों में यही सबसे आम गलती है। और सख्त ब्रिसल वाला ब्रश, जो यहाँ आज भी खूब बिकता और खरीदा जाता है, फायदे से ज़्यादा नुकसान करता है। लगभग सबके लिए सही चुनाव नरम है।

मुँह की सफाई

जो औज़ार रखने लायक हैं

नरम टूथब्रश। हर तीन महीने में बदलिए, या जब ब्रिसल फैल जाएँ।

इंटरडेंटल ब्रश या फ्लॉस। भारत के ज़्यादातर बड़ों पर इंटरडेंटल ब्रश बेहतर बैठता है, क्योंकि मसूड़ों की बीमारी पहले ही गैप चौड़े कर चुकी होती है। सटे दाँतों के लिए फ्लॉस।

जीभी। यहाँ ज़्यादातर घरों में पहले से है। इसे हल्के हाथ से, पीछे से आगे, दिन में एक बार चलाइए।

फ्लोराइड टूथपेस्ट। ट्यूब पर देख लीजिए कि फ्लोराइड लिखा है। भारत में बिकने वाले कई मशहूर हर्बल और आयुर्वेदिक पेस्ट में यह होता ही नहीं, और कीड़े को असल में यही रोकता है।

पावर ब्रश, अगर चाहिए तो। यह उन लोगों की सबसे ज़्यादा मदद करता है जिनके हाथ अकड़े हैं, जिनके तार लगे हैं, या जिन्हें चालीस सेकंड में ब्रश खत्म करने की आदत है। यह ज़रूरी नहीं है।

दातुन और नीम की टहनी। खूब चलती हैं और बेकार नहीं हैं। पर ये सिर्फ उन सतहों को साफ करती हैं जिन्हें छूती हैं, और दाँतों के बीच कुछ नहीं करतीं। अगर आप इन्हें चलाते हैं, तो दाँतों के बीच वाला कदम अलग से करना ही पड़ेगा।

दाँतों के बीच सफाई

दाँतों के बीच की सतहें हर दाँत का करीब एक तिहाई हिस्सा हैं और ब्रश उन्हें कभी नहीं छूता। मसूड़ों की बीमारी यहीं से शुरू होती है, और बड़ों के कीड़े का बड़ा हिस्सा भी।

फ्लॉस: करीब 45 सेंटीमीटर लीजिए और बीच वाली उँगलियों पर लपेटिए। हल्के से दो दाँतों के बीच ले जाइए, एक दाँत की बगल में C का आकार बनाइए, और मसूड़े के ठीक नीचे सरकाइए। फिर अगले गैप के लिए साफ हिस्सा ले लीजिए।

इंटरडेंटल ब्रश: वह नाप चुनिए जो बिना ज़ोर घुस जाए, उसे मसूड़े की किनार पर रखिए, और दो-तीन बार अंदर-बाहर कीजिए। भारत के जिन बड़ों को मसूड़ों की कोई भी बीमारी है, उनके लिए यही आसान और ज़्यादा असरदार औज़ार है।

टूथपिक कभी रोज़ का तरीका नहीं। वह दाँत की सतह के साथ नहीं चल सकती, इसलिए सफाई करने के बजाय दो दाँतों के बीच के मसूड़े के छोटे त्रिकोण में दबकर उसे बैठा देती है। वह ऊतक दोबारा नहीं उगता।

वॉटर फ्लॉसर या फ्लॉस?

फ्लॉस दाँत की सतह से सीधे प्लाक हटाता है। वॉटर फ्लॉसर कचरा बहाता है और मसूड़ों की सूजन घटाता है, और तारों, इम्प्लांट और अकड़े हाथों के साथ यह सचमुच काम का है।

यहाँ ज़्यादातर लोगों के लिए यह पहली खरीद नहीं, महँगा अतिरिक्त सामान है। फ्लॉस या इंटरडेंटल ब्रश उसका छोटा सा हिस्सा खर्च करके असली काम कर देते हैं।

कीड़ा — यह लगता कैसे है और रुकता कैसे है

दाँतों में कीड़ा उन बैक्टीरिया से लगता है जो शक्कर खाकर एसिड बनाते हैं और इनैमल का खनिज घोल देते हैं। यह शुरुआती खनिज घटने से शुरू होकर इनैमल में गड्ढा, फिर डेंटिन, फिर पल्प, और आखिर में जड़ की नोक पर इन्फेक्शन तक जाता है।

मीठा कितनी बार खाया, यह कितना खाया से ज़्यादा मायने रखता है। हर बार का मीठा करीब बीस मिनट का एसिड हमला शुरू करता है। दोपहर के खाने के बाद एक मिठाई, दोपहर भर घूँट-घूँट पी जाने वाली मीठी चाय से कम नुकसान करती है।

यही इस दिक्कत का भारतीय रूप है, और इसे साफ कहना ज़रूरी है। दिन में चार-पाँच बार चीनी वाली चाय, त्योहारों की मिठाई, बिस्किट की आदत। बच्चों को रात में मीठा दूध, और जेब में रखी टॉफी। ये सब एक ही तरह काम करते हैं और जागने के ज़्यादातर घंटे मुँह को एसिड वाला बनाए रखते हैं।

यहाँ कीड़े को असल में क्या रोकता है:

  1. फ्लोराइड टूथपेस्ट, दिन में दो बार, थूककर — पानी से धोकर नहीं।
  2. मीठे के मौके कम कीजिए, ज़रूरी नहीं कि कुल चीनी ही कम हो।
  3. रोज़ दाँतों के बीच सफाई।
  4. मीठा खाने या पीने के बाद पानी।
  5. बच्चों की पहली पक्की दाढ़ों पर सीलेंट।
  6. साल में एक बार डेंटल जाँच।

“फ्लोराइड वाला पानी पीजिए” वाली विदेशी सलाह यहाँ लागू नहीं होती। भारत अपने पानी में फ्लोराइड नहीं मिलाता। देश के बड़े हिस्सों में उल्टा कुदरती तौर पर ज़्यादा फ्लोराइड है, जिससे दाँतों का और गंभीर हालत में हड्डियों का फ्लोरोसिस होता है।

अगर आप ऐसे ज़िले में रहते हैं, तो फ्लोराइड का सवाल उल्टी दिशा में चलता है और डेंटिस्ट से सीधे पूछने लायक है।

मसूड़ों की बीमारी, या पायरिया

भारतीय मुँहों में मसूड़ों की बीमारी का इलाज सबसे कम होता है, क्योंकि उसके शुरुआती दौर में दर्द नहीं होता। जिन्हें यह है, उनमें से ज़्यादातर को पता ही नहीं।

जिंजिवाइटिस वह दौर है जो पलट जाता है। मसूड़े की किनार पर बैठा प्लाक ऊतक में सूजन कर देता है। मसूड़े ज़्यादा लाल और फूले दिखते हैं और ब्रश करते समय खून आता है।

ब्रश करते समय खून आना सामान्य नहीं है, और यह ज़ोर से ब्रश करने की निशानी भी नहीं है। यह मौजूद सबसे भरोसेमंद शुरुआती संकेत है।

और लोग जो आम जवाब देते हैं — और हल्के से ब्रश करना — वह इसे बिगाड़ता है।

इस दौर में यह अपने आप ठीक हो जाता है। मसूड़े की किनार से रोज़ प्लाक हटाना और एक बार पेशेवर सफाई, आमतौर पर दो हफ्ते में इसे बैठा देते हैं।

पीरियोडोंटाइटिस, जिसे यहाँ लगभग हर आदमी पायरिया कहता है, वह दौर है जो पलटता नहीं। सूजन मसूड़े के नीचे जाकर दाँत थामने वाली हड्डी को खत्म करती है। हड्डी दोबारा नहीं उगती।

  1. मसूड़े पीछे हटना, जिससे दाँत पहले से लंबे दिखने लगें
  2. मुँह की बदबू या ऐसा स्वाद जो ब्रश करने से नहीं जाता
  3. दाँत ढीले लगना, या काटने का ढंग बदल जाना
  4. मसूड़े की किनार पर पीप या टीस
  5. जो दाँत पहले सटे थे, उनके बीच जगह खुलना

इलाज मसूड़े के नीचे गहरी सफाई है, कभी एक से ज़्यादा मुलाकातों में। यह नुकसान रोक देता है। जो हो चुका उसे पलटता नहीं।

ज़्यादा खतरा किसे। तंबाकू लेने वालों को, शुगर वालों को, और मुँह सुखाने वाली दवाएँ लेने वालों को। गर्भावस्था और मेनोपॉज में। और जिनके परिवार में कम उम्र में दाँत गिरने का इतिहास हो।

शुगर और मसूड़ों की बीमारी एक-दूसरे को खिलाती हैं, और भारत में यह बहुत मायने रखता है। काबू से बाहर शुगर मसूड़ों की बीमारी बिगाड़ती है, और मसूड़ों की सूजन शुगर काबू करना मुश्किल कर देती है।

जिन्हें शुगर है उन्हें मसूड़े जँचवाते रहना चाहिए। और जिनकी मसूड़ों की बीमारी बिना किसी साफ वजह के जिद्दी बनी है, उन्हें शुगर जँचवानी चाहिए।

तंबाकू चेतावनी छिपा देती है। इससे खून आना घट जाता है, इसलिए चबाने या पीने वाले की बीमारी बढ़ी हो सकती है और मसूड़े शांत दिखते रह सकते हैं। तंबाकू लेने वाले में खून का न आना कोई तसल्ली नहीं है।

मुँह की बदबू

लगातार बनी रहने वाली बदबू एक संकेत है, शर्म की बात नहीं। इसका करीब 85 से 90 प्रतिशत मुँह से ही शुरू होता है, यानी वजह मिल जाए तो इसे आमतौर पर ठीक किया जा सकता है।

सबसे आम वजह जीभ है। पीछे की खुरदुरी सतह बैक्टीरिया, मरे हुए सेल और खाने के अवशेष रोक लेती है, और वे बैक्टीरिया सल्फर वाले यौगिक छोड़ते हैं। दाँतों पर ब्रश करने से उसे कुछ नहीं होता।

यह वह जगह है जहाँ आम भारतीय आदत पहले से सही है। जीभी हल्के हाथ से, पीछे से आगे, दिन में एक बार चलाइए। यह उस परत का टूथब्रश से कहीं ज़्यादा हिस्सा हटाती है, और इसमें दस सेकंड लगते हैं।

  1. मसूड़ों की बीमारी। जेबों में बैठे बैक्टीरिया एक खास तरह की टिकी हुई बदबू बनाते हैं।
  2. सूखा मुँह। लार मुँह का अपना कुल्ला है, इसलिए जो चीज़ भी उसे घटाती है, बदबू गाढ़ी कर देती है। सुबह की बदबू इसीलिए सामान्य है।
  3. बिना इलाज के कीड़े और खाना फँसने की जगहें, जिनमें ब्रिज के नीचे और क्राउन के आसपास शामिल हैं।
  4. तंबाकू और पान — सीधे भी, और मुँह सुखाकर व मसूड़ों की बीमारी बढ़ाकर भी।
  5. तेज़ महक वाला खाना। लहसुन, प्याज़ और कुछ मसाले खून के रास्ते फेफड़ों से निकलते हैं। यह सफाई की चूक नहीं है और कितना भी ब्रश करने से नहीं जाता।

जो काम नहीं करता — शराब वाला माउथवॉश बीस मिनट बदबू ढँकता है और फिर मुँह सुखा देता है, जिससे असली दिक्कत बिगड़ती है। मिंट और मीठी सुपारी वही करते हैं, ऊपर से चीनी के साथ। खाने के बाद सौंफ और इलायची अच्छी और बेज़रर हैं, पर वे ढँकती हैं, ठीक नहीं करतीं।

अगर आपकी सफाई अच्छी है, जीभ साफ है, और डेंटिस्ट ने मसूड़ों की बीमारी व कीड़ा खारिज कर दिया है, तो टिकी हुई बदबू डॉक्टर से पूछने लायक है। टॉन्सिल स्टोन, साइनस का इन्फेक्शन, एसिड का उलटा आना, बेकाबू शुगर, और लिवर या किडनी की बीमारी — ये सब ऐसे ही दिख सकते हैं।

मुँह का कैंसर — यह हिस्सा यह लेख नरम नहीं करेगा

मुँह की सेहत में भारत बाकी दुनिया से सबसे ज़्यादा यहीं अलग है, और यह किसी सूची की एक पंक्ति नहीं, अपनी जगह का हकदार है।

मुँह और गले का कैंसर भारतीय पुरुषों के सबसे आम कैंसरों में है, और इसके पीछे ज़्यादातर तंबाकू है — पी जाने वाली से कहीं ज़्यादा चबाई जाने वाली। सुपारी अपने आप में भी खतरा रखती है, भले उसमें तंबाकू न मिली हो।

यह आमतौर पर देर से पकड़ा जाता है, और इसीलिए बचने की दर खराब है। ऐसा होना ज़रूरी नहीं था। मुँह तो दिखता है।

वे संकेत जिनके लिए महीनों नहीं, दिनों में डेंटिस्ट या ENT चाहिए:

  1. ऐसा छाला जो दो हफ्ते में न भरे
  2. सफेद या लाल धब्बा जो रगड़ने से न जाए
  3. गाल के अंदर कोई गाँठ या सख्त जगह
  4. मुँह पूरा खोलने में दिक्कत, जो ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस की निशानी हो सकती है
  5. सुन्नपन, या एक कान की तरफ जाता दर्द
  6. बिना किसी साफ वजह के ढीला हो गया दाँत

मुँह कम खुलने पर यहाँ खास ध्यान चाहिए। ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस का सुपारी से गहरा रिश्ता है और यह कैंसर से पहले की हालत है। भारत में यह आम है और बाकी लगभग हर जगह दुर्लभ।

अगर आप किसी भी रूप में तंबाकू या सुपारी लेते हैं, तो उसे छोड़ना आपके मुँह के लिए सबसे बड़ी चीज़ है। और वह इस गाइड की बाकी हर बात को जोड़कर भी उससे ज़्यादा करता है।

मुँह की खराब सेहत से जुड़ी दूसरी बीमारियाँ

रिसर्च में मसूड़ों के बैक्टीरिया और उनसे होने वाली सूजन का रिश्ता दिल की बीमारी से जुड़ा मिला है। और मसूड़ों की बीमारी व शुगर दोनों तरफ से एक-दूसरे को बिगाड़ते हैं।

मुँह के बैक्टीरिया साँस के साथ फेफड़ों में जाकर निमोनिया कर सकते हैं, जो बिस्तर पर पड़े और बुज़ुर्ग लोगों में सबसे ज़्यादा मायने रखता है।

गर्भावस्था में मसूड़ों की बीमारी का रिश्ता समय से पहले जन्म और कम वजन वाले बच्चे से जुड़ा मिला है। यही वजह है कि डेंटल जाँच गर्भावस्था के बाद नहीं, उसी दौरान करानी चाहिए।

खाना

काम की चीज़ें — दूध, दही और पनीर, जो कैल्शियम देते हैं और एसिड दबाते हैं। रेशेदार सब्जी और फल। मेवे। पानी।

जिस तरह से आमतौर पर खाई जाती हैं, उस तरह नुकसान वाली चीज़ें ये हैं। दिन भर मीठी चाय, कोल्ड ड्रिंक, चिपकने वाली मिठाई और टॉफी। और हर होटल के दरवाज़े पर रखी चीनी चढ़ी सौंफ।

कुछ पुरानी आदतों का नाम ईमानदारी से लेना चाहिए। बैक्टीरिया के लिए गुड़ भी चीनी ही है। गन्ने का रस मीठा ड्रिंक है। मीठी भरावन वाला पान मीठा भी है, और अगर उसमें सुपारी या तंबाकू है तो मीठे से कहीं ज़्यादा बुरा।

डेंटिस्ट के पास कब जाएँ

साल में एक बार जाँच और स्केलिंग के लिए, चाहे कुछ दुखता हो या न हो। ज़्यादातर बड़ों के लिए बचाव का पूरा कार्यक्रम यही है।

इससे पहले तब जाइए, जब अच्छी सफाई के दो हफ्ते बाद भी खून आता रहे, या चबाने पर दर्द हो। सिनसिनाहट बढ़ रही हो, कोई दाँत ढीला हो, सूजन हो, या ऊपर बताए मुँह के कैंसर के संकेतों में से कुछ दिखे।

देर करने की आम वजह पैसा है। सरकारी डेंटल अस्पताल और डेंटल कॉलेज बहुत कम पैसे में या मुफ्त इलाज करते हैं, और भारतीय शहरों में ठीक जाँच का सबसे सस्ता रास्ता अक्सर डेंटल कॉलेज ही होता है।

मसूड़ों से खून आना: इसे आम बात मत समझिए

ब्रश करते वक्त थोड़ा खून आ जाए तो ज़्यादातर लोग ध्यान नहीं देते। पर स्वस्थ मसूड़ों से खून नहीं आता। मसूड़ों से खून आना सबसे पहला और सबसे साफ इशारा है कि उनमें सूजन है।

होता क्यों है

दाँतों और मसूड़ों के बीच जमी परत में बैक्टीरिया पनपते हैं। शरीर उनसे लड़ता है तो मसूड़े सूज जाते हैं, और हल्का सा छूने पर भी खून निकल आता है। इसे जिंजिवाइटिस कहते हैं।

इस पहली अवस्था में यह पूरी तरह ठीक हो जाता है। छोड़ दिया जाए तो यही आगे चलकर पायरिया बनता है, जिसमें दाँत पकड़ने वाली हड्डी घटने लगती है। वह हड्डी वापस नहीं आती।

तंबाकू खाने वालों के लिए एक ज़रूरी चेतावनी

गुटखा, खैनी और ज़र्दा मसूड़ों की खून की नलियों को सिकोड़ देते हैं। इसलिए मसूड़े बीमार होने पर भी खून नहीं आता। यहाँ खून न आना राहत की बात नहीं, धोखे की बात है।

डेंटिस्ट के पास कब जाएँ

अगर सफाई सुधारने के दो हफ्ते बाद भी मसूड़ों से खून आना बंद न हो, मसूड़े पीछे हट रहे हों, कोई दाँत हिल रहा हो, या मुँह से लगातार बदबू आ रही हो, तो डेंटिस्ट को दिखाइए।

और मुँह में कोई छाला या सफेद-लाल चकत्ता दो हफ्ते में ठीक न हो तो उसे टालिए मत। भारत में मुँह का कैंसर बहुत आम है, और शुरू में वह दर्द नहीं करता।

घर पर क्या करें

दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से हल्के हाथ से ब्रश, और दिन में एक बार दाँतों के बीच की सफाई। शुरू के एक-दो हफ्ते खून आ सकता है, फिर अपने आप बंद हो जाता है।

ब्रश ज़ोर से मत घिसिए। खून देखकर लोग सफाई छोड़ देते हैं, और यही सबसे बड़ी गलती है। सफाई रुकते ही सूजन और बढ़ती है।

खास बातें

दिन में दो बार, दो-दो मिनट, फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश। दिन में एक बार दाँतों के बीच सफाई। और मीठा खाने के साथ, दिन भर नहीं। लगातार करना ज़ोर लगाने से बेहतर है।

सब कुछ प्लाक से शुरू होता है, और आपके पास 24 से 72 घंटे हैं। उसके बाद वह सख्त होकर टार्टर बन जाता है और उसे सिर्फ डेंटिस्ट हटा सकता है।

ब्रश करते समय खून आते मसूड़े ज़्यादा ज़ोर से ब्रश नहीं किए जा रहे। वह जिंजिवाइटिस है, और उस दौर में यह पूरी तरह पलट जाता है। पायरिया बन जाने के बाद हड्डी का नुकसान पक्का है।

ज़्यादातर बदबू जीभ से आती है। जीभी, पीछे से आगे, दिन में एक बार — यह किसी भी माउथवॉश से ज़्यादा करती है।

मीठा कितनी बार, यह कितना से ज़्यादा मायने रखता है। दिन में पाँच बार मीठी चाय एक मिठाई से ज़्यादा नुकसान करती है।

देख लीजिए कि आपके टूथपेस्ट में सचमुच फ्लोराइड है, और फ्लोरोसिस वाले ज़िलों में बच्चों के लिए सही मात्रा डेंटिस्ट से पूछिए।

भारत में मुँह की सेहत की सबसे बड़ी दिक्कत तंबाकू और सुपारी है, और तंबाकू चेतावनी छिपा भी देती है। अगर आप इनमें से कुछ लेते हैं, तो सबसे पहले वही बदलिए।

साल में एक डेंटल मुलाकात, स्केलिंग और पूरे मुँह की एक नज़र — यही सबसे सस्ती डेंटिस्ट्री है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कितनी बार ब्रश करना चाहिए?

दिन में दो बार, हर बार दो मिनट, फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से। रात का ब्रश सुबह से ज़्यादा मायने रखता है, क्योंकि नींद में लार बनना घट जाती है और दाँतों पर जो बचा है वह वहीं पड़ा रहता है।

क्या मेरे टूथपेस्ट में फ्लोराइड है?

ट्यूब देखिए। भारत में बिकने वाले कई मशहूर हर्बल और आयुर्वेदिक ब्रांड में यह होता ही नहीं, और कीड़े को असल में यही रोकता है। अगर पैक पर फ्लोराइड नहीं लिखा, तो शायद उसमें है भी नहीं।

क्या ब्रश के बाद पानी से कुल्ला करना चाहिए?

बेहतर है न करें। ज़्यादा झाग थूक दीजिए और टूथपेस्ट की पतली परत दाँतों पर रहने दीजिए। कुल्ला करने से वह फ्लोराइड बह जाता है जो अभी-अभी लगाया था।

क्या दातुन या नीम की टहनी काफी है?

वह जिन सतहों को छूती है उन्हें साफ करती है, और कुछ लोग उससे ठीक भी चलाते हैं। पर वह दाँतों के बीच सफाई नहीं करती, इसलिए वह कदम अलग से करना ही पड़ेगा।

क्या फ्लॉस करना सचमुच ज़रूरी है?

दाँतों के बीच सफाई करना ज़रूरी है। वह फ्लॉस से करें या इंटरडेंटल ब्रश से, यह आपके गैप पर निर्भर है। भारत के जिन बड़ों को मसूड़ों की कोई बीमारी है, उनके लिए इंटरडेंटल ब्रश आसान है और बेहतर काम करता है।

क्या सिर्फ टूथपिक से काम चल जाएगा?

नहीं। वह खाना हटा देती है, जो कभी-कभार ठीक है। पर रोज़ के तरीके के तौर पर वह दाँतों के बीच के मसूड़े में दबकर उसे हमेशा के लिए बैठा देती है।

ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आता है। क्या और हल्के से ब्रश करूँ?

नहीं। खून इस बात की निशानी है कि मसूड़े की किनार पर प्लाक बैठा है, और कम सफाई करने से यह बिगड़ता है। ठीक से पर हल्के हाथ से सफाई कीजिए, दाँतों के बीच सफाई जोड़िए, और एक-दो हफ्ते में इसके बैठने की उम्मीद रखिए। न बैठे तो डेंटिस्ट को दिखाइए।

मैं गुटखा चबाता हूँ पर मसूड़ों से खून नहीं आता। क्या वे ठीक हैं?

ज़रूरी नहीं। तंबाकू से खून आना घट जाता है, इसलिए मसूड़े शांत दिखते हुए भी बीमारी बढ़ी हो सकती है। खून से अंदाज़ा लगाने के बजाय जँचवाइए।

स्केलिंग कितनी बार करानी चाहिए?

ज़्यादातर बड़ों के लिए साल में एक बार, और मसूड़ों की बीमारी या शुगर हो तो उससे ज़्यादा। इससे दाँत ढीले या कमज़ोर नहीं होते, जो आम डर है। यह उस जमाव को हटाती है जो उन्हें ढीला कर रहा था।

क्या स्केलिंग से दाँत खराब होते हैं या बीच में जगह बन जाती है?

नहीं। जो जगह बाद में दिखती है वह पहले से थी, बस उसमें टार्टर और सूजा मसूड़ा भरा था। टार्टर हटने से वह दिखने लगती है, बनती नहीं।

क्या माउथवॉश ज़रूरी है?

नहीं। डेंटिस्ट कहे तो थोड़े समय के लिए यह काम का हो सकता है। पर यह ब्रश करने और दाँतों के बीच सफाई की जगह नहीं लेता, और रोज़ इस्तेमाल किया जाने वाला शराब वाला माउथवॉश मुँह सुखा देता है।

बच्चे को पहली बार डेंटिस्ट कब दिखाएँ?

पहले जन्मदिन तक, या पहला दाँत आने के छह महीने के अंदर। यहाँ ज़्यादातर लोग बहुत देर से आते हैं, और इसीलिए बचपन का कीड़ा आमतौर पर दर्द वाले दौर में पकड़ा जाता है।

क्या बच्चों को फ्लोराइड टूथपेस्ट देना चाहिए?

आमतौर पर हाँ। तीन साल तक चावल के दाने जितना और उसके बाद मटर के दाने जितना, और निगरानी में, ताकि वह थूका जाए। अगर आपके ज़िले के भूजल में फ्लोराइड ज़्यादा है तो डेंटिस्ट को बताइए ताकि सलाह बदली जा सके।

मुँह के कैंसर के कौन से संकेत नहीं छोड़ने चाहिए?

ऐसा छाला जो दो हफ्ते में न भरे, सफेद या लाल धब्बा जो रगड़ने से न जाए, गाल के अंदर गाँठ, मुँह कम खुलना, सुन्नपन, या एक कान की तरफ जाता दर्द। इनमें से कुछ भी हो तो दिनों के अंदर डेंटिस्ट या ENT चाहिए।

डेंटल चेकअप का खर्च कितना आता है?

प्राइवेट क्लीनिक में जाँच और स्केलिंग उससे कहीं सस्ती है जो वह बचाती है। और सरकारी डेंटल अस्पताल व डेंटल कॉलेज बहुत कम या कुछ भी नहीं लेते। यहाँ पैसा उतनी बड़ी अड़चन नहीं है जितनी लोग समझते हैं।

क्या मसूड़ों की बीमारी पलटी जा सकती है?

जिंजिवाइटिस, हाँ, पूरी तरह। पायरिया, नहीं। इलाज नुकसान रोक देता है पर जो हड्डी जा चुकी उसे वापस नहीं बनाता। इसीलिए शुरुआती संकेतों पर कदम उठाने लायक है।

शब्दावली

प्लाक: बैक्टीरिया की वह नरम और बिना रंग वाली परत जो दाँतों पर लगातार बनती रहती है।

कैल्कुलस या टार्टर: सख्त हो चुका प्लाक, मजबूती से जमा, जिसे सिर्फ डेंटिस्ट हटा सकता है।

डेंटल कैरीज़ या कीड़ा: एसिड बनाने वाले बैक्टीरिया से होने वाला दाँतों का सड़ना।

जिंजिवाइटिस: मसूड़ों की बीमारी का शुरुआती दौर, जो पलट जाता है — लाल, सूजे और खून आते मसूड़े।

पीरियोडोंटाइटिस या पायरिया: मसूड़ों की बढ़ी हुई बीमारी, जो दाँत थामने वाले ऊतक और हड्डी को खत्म करती है।

हैलिटोसिस: लगातार बनी रहने वाली मुँह की बदबू।

फ्लोराइड: वह खनिज जो इनैमल मजबूत करता है और कीड़े से बचाता है। कम हो तो कीड़ा, और ज़्यादा हो — जैसे फ्लोरोसिस वाले इलाकों में — तो दाँतों पर धब्बे।

डेंटल फ्लोरोसिस: इनैमल पर पड़ने वाले धब्बे या दाग, जो दाँत बनते समय ज़्यादा फ्लोराइड मिलने से होते हैं। भूजल की वजह से भारत के कई हिस्सों में आम।

ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस: मुँह की भीतरी परत का सख्त हो जाना, जिसका सुपारी से गहरा रिश्ता है। इससे मुँह कम खुलता है और यह कैंसर से पहले की हालत है।

इनैमल: दाँत की सख्त ऊपरी परत।

डेंटिन: इनैमल के नीचे की परत। खुल जाए तो दाँत सिनसिनाते हैं।

ज़ीरोस्टोमिया या सूखा मुँह: लार का घट जाना, आमतौर पर दवाओं या किसी बीमारी से।

रूट कैरीज़: खुली जड़ों पर लगने वाला कीड़ा, जो मसूड़े पीछे हटे बुज़ुर्गों में आम है।

ब्रक्सिज़्म: दाँत पीसना या भींचना, अक्सर नींद में।

स्केलिंग और रूट प्लानिंग: मसूड़े के नीचे की गहरी सफाई, जो मसूड़ों की बीमारी के इलाज में होती है।

अस्वीकरण

यह लेख सिर्फ आम जानकारी के लिए है और किसी योग्य डेंटिस्ट की निजी सलाह, जाँच या इलाज की जगह नहीं लेता। कोई भी न भरने वाला छाला, सफेद या लाल धब्बा, गाँठ, या मुँह का कम खुलना — इन्हें देखते रहने के बजाय जल्दी जँचवाना चाहिए।

संदर्भ

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Authors

  • डॉ. वसुंधरा, MDS (ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी), BDS

    ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन

    कार्य भूमिका: लेखक

    परिचय (Bio):
    डॉ. वसुंधरा एक अनुभवी ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन हैं जिन्हें दंत सर्जरी, ट्रॉमा मैनेजमेंट और क्रेनियोफेशियल प्रक्रियाओं का अनुभव है। उन्होंने कई जटिल दंत सर्जरी जैसे डेंटल इम्प्लांट, जबड़े की फ्रैक्चर सर्जरी, सिस्ट सर्जरी और अन्य उन्नत दंत प्रक्रियाओं पर काम किया है। वे ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी से संबंधित क्लिनिकल रिसर्च और वैज्ञानिक प्रकाशनों में भी सक्रिय रूप से शामिल हैं।

    विशेष कौशल:
    ओरल सर्जरी, डेंटल इम्प्लांट, मैक्सिलोफेशियल ट्रॉमा उपचार, सर्जिकल प्रक्रियाएँ, क्लिनिकल रिसर्च।

  • डॉ. रुचिका राज, MDS (ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी), BDS

    ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन | मेडिकल कंटेंट विश्लेषक

    कार्य भूमिका: समीक्षक

    परिचय (Bio):
    डॉ. रुचिका राज एक अनुभवी ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन हैं जिन्हें दंत सर्जरी, इम्प्लांटोलॉजी और चिकित्सा अनुसंधान लेखन का अनुभव है। उन्हें क्लिनिकल प्रैक्टिस के साथ-साथ हेल्थकेयर संगठनों के लिए मेडिकल कंटेंट विश्लेषण का भी अनुभव है। उनका कार्य जटिल चिकित्सा और वैज्ञानिक शोध को सरल और प्रमाण आधारित स्वास्थ्य जानकारी के रूप में प्रस्तुत करना है।

    विशेष कौशल:
    ओरल सर्जरी, डेंटल इम्प्लांटोलॉजी, मेडिकल रिसर्च विश्लेषण, वैज्ञानिक लेखन, हेल्थकेयर कंटेंट डेवलपमेंट।

     

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