
इस सीरीज़ के बारे में। रिवर्स एजिंग दस भागों की सीरीज़ है — बुढ़ापे की साइंस आज क्या कर सकती है, क्या अभी नहीं कर सकती, और लंबी व सेहतमंद ज़िंदगी का काम, पैसे और परिवार पर क्या असर होगा। यह भाग 2 है: हम सचमुच कितना जी सकते हैं, और क्या वे अतिरिक्त साल सेहतमंद होंगे।
भारत यह प्रयोग एक बार कर चुका है। 1950 से आज तक हमने औसत उम्र में करीब तीस साल जोड़े। उस वक्त किसी ने यह नहीं पूछा कि वे बढ़े हुए साल किस हालत में बीतेंगे।
जवाब अब सामने आ रहा है।
एक नज़र में
बुढ़ापा धीमा करना, टालना और पलटना — ये तीन अलग दावे हैं। इनमें से सिर्फ पहले दो क्लीनिक के आसपास हैं। पलटना सेल और चूहों में दिखा है, इंसानों में नहीं।
भारत में उम्र और सेहतमंद उम्र का फासला बाकी देशों से ज़्यादा चौड़ा है। हमने साल ज़िंदगी की शुरुआत में जोड़े। नतीजा यह कि बड़ी आबादी साठ पर पहुँचते-पहुँचते शुगर, बीपी या दिल की बीमारी लेकर आती है।
ब्लू ज़ोन से सीखने लायक बहुत है, हालाँकि उनके पीछे के आंकड़ों पर सवाल उठे हैं। आदतों पर सवाल नहीं उठा। और वे आदतें शहर बनने से पहले की आम भारतीय ज़िंदगी जैसी दिखती हैं।
जैविक उम्र का अंदाज़ा अब DNA मिथाइलेशन और दूसरे मार्कर से लगाया जा सकता है। ये टेस्ट रिसर्च के औज़ार हैं जो ग्राहकों को बेचे जा रहे हैं। एक बार की रीडिंग बहुत कम बताती है।
सप्लीमेंट की दुकान पर रखी कोई चीज़ इंसान की सेहतमंद उम्र बढ़ाती साबित नहीं हुई। जो काम करता है वह है एक्सरसाइज़, खाना, नींद, शुगर पर काबू और लोगों से जुड़े रहना। इनमें से कुछ भी बिकाऊ नहीं है।
धीमा करना, टालना या पलटना — तीन अलग दावे
इन तीनों को एक जैसा बोल दिया जाता है। ये एक चीज़ नहीं हैं।
धीमा करने का मतलब है नुकसान कम रफ्तार से जमा हो, ताकि आप ज़्यादा समय सेहतमंद रहें।
टालने का मतलब है बीमारी और कमज़ोरी की उम्र आगे खिसक जाए, चाहे अंदर की प्रोसेस चलती रहे।
पलटने का मतलब है सेल या टिशू को जवानी की हालत में वापस ले जाना। लैब में पार्शियल रीप्रोग्रामिंग ने कुछ निशानियाँ उस दिशा में हिलाई हैं। इसका मतलब किसी बुज़ुर्ग को जवान बना देना नहीं है, और इंसानी शरीर में यह हुआ भी नहीं है।
तो अगली बार कोई क्लीनिक या हेडलाइन “पलटना” कहे, तो पूछिए कि इन तीनों में से किसकी बात है। आमतौर पर वे पहली वाली बात कर रहे होते हैं, और अक्सर किसी की नहीं।
रिसर्चर अब जो सवाल पूछते हैं वह ज़्यादा काम का है। उम्र कैसे बढ़ाएँ नहीं, बल्कि सेहतमंद साल कैसे बढ़ाएँ — यानी वे साल जिनमें आप चल-फिर सकें, दिमाग साफ रहे और बड़ी बीमारी न हो।
भाग 1 में हमने देखा था कि बुढ़ापे को एक जैविक प्रोसेस की तरह कैसे खोला जा रहा है। यह हिस्सा लैब से निकलकर रोज़ की ज़िंदगी में आता है।

हम पहले ही ज़्यादा जी रहे हैं, फिर यह तरक्की जैसा क्यों नहीं लगा
भारत में उम्र की बड़ी बढ़त किसी एंटी-एजिंग इलाज से नहीं आई। वह सैकड़ों बिना चमक वाली पब्लिक हेल्थ जीतों से आई।
बीसवीं सदी की शुरुआत में टीबी, निमोनिया, हैजा और फ्लू लोगों को इतनी जल्दी मार देते थे कि दिल की बीमारी होने की उम्र ही नहीं आती थी। एंटीबायोटिक, वैक्सीन, साफ पानी, सुरक्षित प्रसव, माँ की बेहतर देखभाल और ज़्यादा खाना — इन सबने वे मौतें पीछे धकेल दीं।
फिर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और कई कैंसर से बचने की दर भी सुधरी। जल्दी पहचान, बेहतर सर्जरी और बचाव वाली दवा ने यह किया।
दुनिया भर में WHO के मुताबिक 1950 से अब तक औसत उम्र 25 साल से ज़्यादा बढ़ी है। भारत की अपनी बढ़त इससे भी बड़ी रही।
अब वह हिस्सा जो छूट जाता है। ज़्यादा जीने का मतलब अच्छी तरह बूढ़ा होना नहीं है।
बहुत सारे लोग ज़िंदगी के आखिरी दस से बीस साल कोई पुरानी बीमारी संभालते, कम चलते-फिरते या याददाश्त खोते हुए बिताते हैं। इसीलिए लॉन्जेविटी रिसर्च ने साल गिनना छोड़कर सेहतमंद साल गिनना शुरू किया।
उम्र और सेहतमंद उम्र, और यह फासला यहाँ चौड़ा क्यों है
उम्र यानी आप कितना जिए। सेहतमंद उम्र यानी उसमें से कितना समय आप शरीर, दिमाग और रोज़ के कामकाज के लिहाज़ से ठीक रहे।
एक ही बिल्डिंग के दो लोगों को सोचिए, दोनों 95 तक पहुँचेंगे।
एक अब भी सुबह टहलता है, अपना हिसाब खुद रखता है, नाती-पोतों से मिलने सफर करता है, और आखिरी एक-दो साल तक अपने दम पर रहता है।
दूसरे को 58 पर शुगर मिलती है, 68 पर दिल की बीमारी, 78 पर घुटने चलना बंद करा देते हैं, और 88 तक वह घरवालों को पहचानना छोड़ देता है।
उम्र एक। ज़िंदगी बिल्कुल अलग।
इसी फासले को घटाना लॉन्जेविटी मेडिसिन का असली मकसद है। रिसर्चर इसे बीमारी का दौर सिकोड़ना कहते हैं — यानी लोगों को लगभग पूरी ज़िंदगी ठीक रखना और आखिर का ढलान छोटा कर देना।
भारत में यह फासला असामान्य रूप से चौड़ा क्यों है
यहीं से इस लेख का विदेशी संस्करण हमारा नहीं रह जाता।
Longitudinal Ageing Study in India, देश का पहला बड़ा राष्ट्रीय सर्वे बुज़ुर्गों पर, बताता है कि 60 पार भारतीयों में पुरानी बीमारी और कामकाज की सीमाएँ आम हैं। ये आखिरी उम्र का अपवाद नहीं हैं।
इसके साथ The Lancet Diabetes and Endocrinology में छपा ICMR-INDIAB सर्वे रखिए, जिसने 10.1 करोड़ भारतीयों में डायबिटीज़ गिनी, और प्री-डायबिटीज़ वालों की गिनती इससे भी बड़ी पाई।
और UNFPA का अनुमान, कि 2050 तक 60 पार के लोग आबादी का 20% पार कर जाएंगे, और 2046 तक बच्चों से ज़्यादा हो जाएंगे।
इन्हें जोड़िए। बुज़ुर्गों की बहुत बड़ी आबादी, जो पहले से पुरानी बीमारी लेकर आ रही है। और एक ऐसा हेल्थ सिस्टम जो मुख्य रूप से बीमारी दिखने के बाद इलाज करने के लिए बना है। यह लॉन्जेविटी की भारतीय समस्या है, और यह वही समस्या नहीं है जिसे पश्चिम हल कर रहा है।
सौ पार वालों का बढ़ना
100 पार के लोग अब अजूबा नहीं हैं। जापान, इटली, फ्रांस, स्पेन और अमेरिका सब में इनकी गिनती लगातार बढ़ी है।
भारत के आंकड़े कम भरोसेमंद हैं, और वजह सीधी है। जो पीढ़ी अब इस उम्र पर है, उसके जन्म का रजिस्ट्रेशन अधूरा था। इसलिए 105 साल का दावा अक्सर किसी कागज़ से मिलाया नहीं जा सकता।
किसी भी “सौ साल वालों के गाँव” की कहानी पर भरोसा करने से पहले यह याद रखिए। चाहे वह भारत की हो या कहीं और की।
सचमुच के सौ पार वालों पर हुई रिसर्च दिलचस्प है। इनमें से कई बीमारी से बचते नहीं, उसे टाल देते हैं। वे नब्बे के दशक तक ठीक रहते हैं और फिर तेज़ी से ढलते हैं।
जीन का हिस्सा है। कोलेस्ट्रॉल संभालने, सूजन, DNA की मरम्मत और सेल के तनाव से जुड़े जीन के कुछ रूप बहुत लंबा जीने वालों में ज़्यादा मिलते हैं।
पर जीन छोटा हिस्सा है। बड़ी आबादी पर हुई स्टडी बार-बार बताती हैं कि सेहतमंद बुढ़ापे में आदतों और माहौल का हिस्सा जीन से बड़ा है। अपना DNA आप बदल नहीं सकते। पर वह कैसे बर्ताव करेगा, यह तय करने वाली ज़्यादातर चीज़ें आप बदल सकते हैं।
ब्लू ज़ोन असल में क्या बताते हैं, और इसका भारतीय सवाल
बहुत कम विचार ब्लू ज़ोन जितना दूर तक पहुँचे हैं — ओकिनावा, सार्डिनिया, इकारिया, निकोया, और लोमा लिंडा का सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट समुदाय।
रिसर्चर ने इनकी साझा आदतें गिनाईं। सब्जी-दाल पर टिकी थाली, दिन में ही शामिल शारीरिक मेहनत, मजबूत पारिवारिक रिश्ते, घनी बस्तियाँ। तंबाकू लगभग शून्य, ज़िंदगी का एक मकसद, और बिना भागदौड़ वाली रफ्तार।
साइंस अब ज़्यादा सावधान हो गई है। कुछ रिसर्चर ने इन इलाकों की उम्र गिनती के पीछे के जन्म रिकॉर्ड पर सवाल उठाए हैं। पलायन और आर्थिक फर्क सीधी तुलना मुश्किल बना देते हैं।
पर उन आदतों की सूची दोबारा पढ़िए।
सब्जी-दाल वाली थाली। दिन में शामिल मेहनत। एक छत के नीचे बड़ा परिवार। घना मोहल्ला। ऐसा मकसद और रुतबा जो 60 पर खत्म न हो।
यह पचास साल पहले के भारतीय गाँव का वर्णन है। और बहुत हद तक आज के भारतीय कस्बे का भी।
किसी भी भारतीय आबादी पर वैसी स्टडी कभी नहीं हुई जैसी ओकिनावा पर हुई, इसलिए हमारे पास आंकड़े नहीं हैं।
हमारे पास एक असहज बात ज़रूर है। शहरी भारतीय ज़िंदगी उस सूची की हर चीज़ एक साथ हटाती जा रही है। कम चलना। ज़्यादा मैदा और चीनी। छोटे परिवार, लंबा सफर, और ऐसा रिटायरमेंट जो आदमी को उसके काम से काट देता है।
भारत के लिए ब्लू ज़ोन का सवाल यह नहीं है कि कोई विदेशी लाइफस्टाइल कैसे लाएँ। सवाल यह है कि अपनी वाली में से हम कितनी पहले ही फेंक चुके हैं।
क्या आदतें सचमुच जैविक बुढ़ापा धीमा करती हैं?
एक बात बार-बार सामने आती है। रोज़ की आदतें जैविक बुढ़ापे को उतना हिलाती हैं जितना ज़्यादातर लोग सोचते नहीं।
जैविक उम्र में जीन, खाना, चलना-फिरना, नींद, स्ट्रेस, इन्फेक्शन, प्रदूषण और बीमारी का जमा असर दिखता है। जीवन भर के इन असरों के कुल जोड़ को रिसर्चर एक्सपोज़ोम कहते हैं। यही बड़ी वजह है कि एक ही हफ्ते में जन्मे दो लोग 60 पर बहुत अलग हालत में हो सकते हैं।
इस सूची में सबसे मजबूत सबूत एक्सरसाइज़ के हैं। वजन उठाने वाली एक्सरसाइज़ मांसपेशी बचाती है, इंसुलिन का काम सुधारती है, हड्डी मजबूत करती है और बाद में गिरने का खतरा घटाती है। तेज़ चलना या दौड़ना दिल को सहारा देता है, माइटोकॉन्ड्रिया का काम सुधारता है, और भूलने की बीमारी व डिप्रेशन की कम दर से जुड़ा है।
मांसपेशी सिर्फ ताकत के लिए नहीं है। उम्र के साथ मांसपेशी घटने को सार्कोपीनिया कहते हैं। रिसर्च अब मांसपेशी को सेहतमंद बुढ़ापे का अपने आप में एक नियंत्रक मानती है, सिर्फ सामान उठाने का ज़रिया नहीं।
खाना। सब्जी, फल, दाल और दूसरी फलियाँ, मोटे अनाज जैसे बाजरा, ज्वार और बिना पॉलिश चावल, मेवे, और पर्याप्त प्रोटीन।
50 के बाद प्रोटीन ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है और मिलना मुश्किल भी। आम भारतीय शाकाहारी थाली में यहीं गलती होती है। अकेली दाल शायद ही काफी होती है। दही, पनीर, सोया, अंडा जहाँ चलता हो, और अलग-अलग फलियों का मेल — ये उससे ज़्यादा मायने रखते हैं जितना लोगों को बताया जाता है।
नींद। गहरी नींद में दिमाग अपना कचरा साफ करता है, टिशू की मरम्मत होती है, भूख के हार्मोन ठीक होते हैं और इम्युनिटी संभलती है। लगातार कम नींद का रिश्ता मोटापे, दिल की बीमारी, कमज़ोर सोच और तेज़ जैविक बुढ़ापे से जुड़ा है।
मेटाबॉलिक सेहत, जो भारत में पूरा खेल है। बढ़ी शुगर, इंसुलिन रेज़िस्टेंस, पेट की चर्बी और हाई बीपी सालों तक चुपचाप नसों और अंगों को नुकसान पहुँचाते हैं। यहाँ ये इतनी जल्दी शुरू होते हैं कि यह सूची का सबसे ज़्यादा फायदा देने वाला काम है।
बड़ों का टीकाकरण, जिसे भारत लगभग भूल ही गया है। फ्लू, न्यूमोकॉकल और हर्पीज़ ज़ोस्टर की वैक्सीन यहाँ मिलती हैं, पर बहुत कम बुज़ुर्ग लगवाते हैं। 70 की उम्र में छाती का गंभीर इन्फेक्शन अक्सर वही घटना होती है जो आत्मनिर्भरता खत्म कर देती है। इनमें से कुछ रोकी जा सकती हैं।
लोग। लंबी चलने वाली स्टडी बार-बार एक ही बात बताती हैं। जिनके सामाजिक रिश्ते मजबूत हैं, उनमें डिप्रेशन कम, दिल की बीमारी कम, सोच की गिरावट धीमी और मौत का खतरा कम होता है। भारत में इसे परिवार का फर्ज़ कहा जाता है। यह सेहत का इलाज भी है।

क्या कम खाने से ज़्यादा जिया जा सकता है?
कैलोरी घटाने पर जितनी बहस हुई है उतनी कम चीज़ों पर हुई। बात सीधी है — कम खाइए, पर कुपोषित हुए बिना, और बुढ़ापे की कुछ बायोलॉजी धीमी पड़ सकती है।
यह करीब सौ साल पहले चूहों से शुरू हुआ, जो कम खाने पर साफ तौर पर ज़्यादा जिए। बाद में यीस्ट, कीड़ों, मक्खियों और बंदरों में भी ऐसे नतीजे मिले — बीमारी देर से, मेटाबॉलिक सेहत बेहतर, सूजन कम।
क्या यह इंसानों में काम करता है?
ईमानदार जवाब यह है कि उम्र के बारे में कोई नहीं जानता, क्योंकि ऐसी स्टडी में पचास साल लगेंगे। छोटी अवधि की निगरानी वाली स्टडी में इंसुलिन का काम, बीपी, कोलेस्ट्रॉल और सूजन के मार्कर ज़रूर सुधरे हैं।
इंटरमिटेंट फास्टिंग और तय समय में खाना इसके व्यावहारिक रूप हैं। आठ से दस घंटे की खिड़की में खाना, या कुछ दिन उपवास।
इनसे ऑटोफैजी शुरू हो सकती है, यानी सेल की अपनी रीसाइक्लिंग। इसमें खराब प्रोटीन और घिसे हिस्से तोड़कर बदल दिए जाते हैं। सेल स्तर के सबूत दिलचस्प हैं। इंसानों में लंबे समय के सबूत अभी तय नहीं हैं।
भारत बहुत समय से उपवास कर रहा है, और इसके दोनों पहलू हैं
व्रत, एकादशी, नवरात्रि, जैन उपवास, रमज़ान। और कई घरों की यह आम आदत कि शाम का खाना हल्का हो या न हो। ये सब तय समय में खाने के ही रूप हैं। ये रिसर्च से बहुत पहले से चल रहे हैं।
यानी यह तरीका यहाँ जाना-पहचाना है, जो एक फायदा है। पर दो भारतीय चेतावनियाँ विदेशी चेतावनियों से ज़्यादा मायने रखती हैं।
पहली, ऐसा उपवास जो पकौड़ों और मिठाई पर खत्म हो, कैलोरी घटाना नहीं है। रात भर की खिड़की कुछ कर रही होगी। पर उसके बाद की दावत उससे ज़्यादा कर रही है, उल्टी दिशा में।
दूसरी, और यह गंभीर है। अगर आप शुगर की दवा लेते हैं, खासकर सल्फोनिलयूरिया या इंसुलिन, तो डोज़ बदले बिना उपवास खतरनाक हाइपोग्लाइसीमिया कर सकता है। त्योहारों के उपवास के आसपास भारत में यह आम और टाली जा सकने वाली इमरजेंसी है। उपवास से पहले डॉक्टर से बात कीजिए, बाद में नहीं।
उपवास बच्चों, गर्भवती महिलाओं, और खाने से जुड़ी किसी दिक्कत का इतिहास रखने वालों के लिए ठीक नहीं है।
कैलेंडर से आगे उम्र नापना
सोचिए कि आपसे कहा जाए, आप 55 के हैं पर शरीर 47 का दिखता है। या उल्टा।
जैविक उम्र के टेस्ट यही वादा करते हैं। ये DNA मिथाइलेशन, प्रोटीन, मेटाबोलाइट और सूजन के मार्कर से अंदाज़ा लगाते हैं कि सेल के स्तर पर आप कितनी तेज़ी से बूढ़े हो रहे हैं।
इनमें सबसे ज़्यादा पढ़े गए एपिजेनेटिक क्लॉक हैं। ये DNA पर लगे उन केमिकल निशानों को पढ़ते हैं जो उम्र के साथ एक तय ढंग से बदलते हैं।
ये रिसर्च के अच्छे औज़ार हैं, और इनकी असली सीमाएँ भी हैं। एक ही आदमी के लिए अलग-अलग क्लॉक अलग जवाब देते हैं। खून, स्किन और मांसपेशी आपस में मेल नहीं खाते।
ये टेस्ट अब भारत में सीधे ग्राहकों को बिकते हैं, आमतौर पर प्राइवेट लैब और वेलनेस क्लीनिक के ज़रिए। ये रिटेल पैकिंग में रखे रिसर्च के औज़ार हैं।
एक बार की रीडिंग लगभग बेमतलब है। सालों का ट्रेंड शायद कुछ बताए। पर दोनों में से कोई भी वह नहीं बताएगा जो एक शुगर की रीडिंग और एक वॉक नहीं बता देती।
इसका दूसरा आधा हिस्सा पहनने वाले गैजेट हैं। स्मार्टवॉच दिल की धड़कन, चलना, नींद और हार्ट रेट वेरिएबिलिटी नापती हैं। और CGM, जो पहले सिर्फ शुगर के मरीज़ों के लिए थे, अब हर उस आदमी को बेचे जाते हैं जो अपने खाने को लेकर उत्सुक है।
जिस देश में इतनी शुगर पकड़ में ही नहीं आती, वहाँ CGM वाकई आँख खोल सकता है। और यह उतना ही आसानी से चावल के एक बेमतलब उछाल पर परेशान होने का महँगा तरीका भी बन सकता है।
AI को इमेजिंग, खून के मार्कर, जीन और गैजेट के डेटा को जोड़कर सालों पहले बीमारी का अंदाज़ा लगाने के लिए तैयार किया जा रहा है। यह डॉक्टर की समझ का सहारा बनने के लिए है, उसकी जगह लेने के लिए नहीं।
मकसद नंबर जमा करना नहीं है। मकसद है दिक्कत को तब पकड़ना जब वह पलटी जा सकती हो।

क्या जीन एडिटिंग हमें 100 तक पहुँचाएगी?
अगर आदतें नींव हैं, तो जेनेटिक टेक्नोलॉजी शायद अगली मंज़िल है।
CRISPR-Cas9 से साइंटिस्ट DNA के तय हिस्सों को सचमुच बारीकी से बदल सकते हैं। इससे खून की जन्मजात बीमारियों के लिए मंज़ूर इलाज भी बन चुके हैं। Casgevy, जिसे Vertex Pharmaceuticals और CRISPR Therapeutics ने बनाया, सिकल सेल बीमारी और ट्रांसफ्यूज़न पर निर्भर बीटा थैलेसीमिया के लिए FDA से मंज़ूर है।
यह भारत के लिए कोई दूर की विदेशी खबर नहीं है। दोनों बीमारियाँ यहाँ आम हैं।
सरकार ने जुलाई 2023 में मध्य प्रदेश के शहडोल से National Sickle Cell Anaemia Elimination Mission शुरू किया, जो मुख्य रूप से आदिवासी ज़िलों पर केंद्रित है। 2025 के मध्य तक यह छह करोड़ स्क्रीनिंग पार कर चुका था। थैलेसीमिया मेजर कई समुदायों में भारी बोझ है, और ज़्यादातर परिवारों के लिए इसका मतलब जीवन भर खून चढ़ाना है।
यानी जीन एडिटिंग का पहला असली इलाज उन्हीं दो बीमारियों के लिए आया जो भारत में बड़ी गिनती में हैं। और यहाँ अड़चन साइंस नहीं है।
अड़चन यह है कि करोड़ों में बिकने वाला एक बार का इलाज ज़िला अस्पताल तक नहीं पहुँचता। यही फासला तय करेगा कि इस दशक में भारतीयों को जेनेटिक मेडिसिन का फायदा मिलेगा या नहीं।
क्या यही टेक्नोलॉजी बुढ़ापा धीमा कर सकती है?
रिसर्चर उन जीन पर काम कर रहे हैं जो बहुत लंबी उम्र से जुड़े हैं। इनमें FOXO3 है, जो तनाव झेलने और सेल की देखभाल से जुड़ा है, और APOE, जो अल्ज़ाइमर के खतरे पर असर डालता है। दूसरे लोग DNA की मरम्मत, सूजन, माइटोकॉन्ड्रिया और सेनेसेंस पर काम कर रहे हैं।
सिद्धांत में, इन रास्तों को बदलकर उम्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा घटाया जा सकता है।
हकीकत में यह अभी बहुत दूर है। बुढ़ापे का कोई एक जीन नहीं होता। बुढ़ापा हज़ारों आपस में जुड़े रास्तों से बनता है, जिन्हें जीवन भर का माहौल आकार देता है। एक को हिलाइए तो दूसरे हिलते हैं, और हमेशा उस दिशा में नहीं जिसमें आप चाहते थे।
नैतिक सवाल हर जगह अनसुलझे हैं। एडिटिंग सिर्फ बीमारी के लिए हो, या सुधार के लिए भी? यह किसे मिले? कोई देश ऐसी टेक्नोलॉजी को कैसे नियंत्रित करे जो बायोलॉजी हमेशा के लिए बदल देती है? फिलहाल जीन एडिटिंग रिसर्च का ताकतवर औज़ार है, लंबी उम्र की रणनीति नहीं।
हकीकत की जाँच, और यहाँ क्या बेचा जा रहा है
लॉन्जेविटी का धंधा तेज़ी से बढ़ा है, और उसके साथ बढ़ा-चढ़ाकर बोलना भी।
हर कुछ महीने में कोई नया चमत्कारी सप्लीमेंट, कोई जादुई डाइट, या बुढ़ापा पलटने वाला कोई इलाज आ जाता है। इन्फ्लुएंसर रोज़ दो दर्जन कैप्सूल का रूटीन बेचते हैं, प्राइवेट टेस्ट पैनल बेचते हैं, और ऐसे इलाज बेचते हैं जो सिर्फ उन क्लीनिक में मिलते हैं जो अपने नतीजे छापते नहीं।
ब्रायन जॉनसन का “Don’t Die” प्रोजेक्ट इसका सबसे दिखने वाला रूप है — भारी निगरानी, सख्त नियम और प्रयोग वाले इलाज, जिनका डेटा छापा जाता है। यह एक आदमी का निजी प्रयोग है, सबूत नहीं। इसे इसी तरह पढ़ा जाना चाहिए।
हार्वर्ड के प्रोफेसर डेविड सिंक्लेयर ने इस सोच को फैलाने में सबसे ज़्यादा काम किया है कि बुढ़ापे का इलाज मुमकिन हो सकता है। वे सर्टुइन, NAD और एपिजेनेटिक बदलाव पर काम करते हैं। वे जिन बातों की चर्चा करते हैं, उनमें से ज़्यादातर अभी प्रयोग के दौर में हैं।
हकीकत ज़्यादा फीकी है। किसी सप्लीमेंट के बारे में यह नहीं दिखा है कि वह इंसान की उम्र ठीक-ठाक बढ़ाता हो। NMN, निकोटिनामाइड राइबोसाइड, रेस्वेराट्रोल, स्पर्मिडीन, मेटफॉर्मिन, रैपामाइसिन और सेनोलिटिक। इन सब पर सच्ची स्टडी चल रही है, और कोई भी सेहतमंद आदमी को सलाह देने लायक नहीं है।
भारत में एक और परत है। लॉन्जेविटी और एंटी-एजिंग सप्लीमेंट यहाँ न्यूट्रास्युटिकल के नाम पर बिकते हैं, जिन्हें FSSAI खाने की तरह देखता है, दवा की तरह नहीं। यानी उनके असर की जाँच नहीं होती। किसी चीज़ का भारत में कानूनी रूप से बिकना यह नहीं बताता कि वह काम करती है। विदेशी लेबल भी नहीं बताता।
सबसे मजबूत सबूत अब भी उसी बोरिंग सूची के पास हैं। रोज़ चलिए, असली खाना खाइए, ठीक से सोइए, वजन और कमर काबू में रखिए। तंबाकू छोड़िए, शराब कम कीजिए, स्ट्रेस संभालिए, लोगों से जुड़े रहिए। ये सब मिलकर किसी भी डिब्बे से आगे हैं।
सेहतमंद नब्बे साल वालों का देश यहाँ क्या मायने रखेगा
मान लीजिए बड़ी संख्या में लोग नब्बे तक ठीक-ठाक रहने लगें।
पढ़ाई 22 साल पर खत्म होने वाली चीज़ नहीं रहेगी। नौकरियाँ लंबी चलेंगी और ज़्यादा बदलेंगी। रिटायरमेंट चट्टान नहीं, ढलान बन जाएगा।
एक परिवार में चार या पाँच पीढ़ियाँ एक साथ हो सकती हैं। भारत इसके लिए ज़्यादातर देशों से सांस्कृतिक रूप से बेहतर तैयार है, और आर्थिक रूप से उससे कहीं ज़्यादा कमज़ोर जितना वह समझता है।
यही हिस्सा ठहरकर सोचने लायक है। ज़्यादातर भारतीयों के पास कोई पेंशन है ही नहीं। EPF और NPS जैसे इंतज़ाम बहुत थोड़े लोगों को ही मिलते हैं।
बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है, जहाँ रिटायर होने की उम्र नहीं है क्योंकि रिटायरमेंट ही नहीं है। उनके लिए सेहतमंद उम्र कोई वेलनेस का लक्ष्य नहीं है। वह कमाने और भूखे रहने के बीच का फर्क है।
इसलिए लॉन्जेविटी का भारतीय सवाल यह नहीं है कि लंबी रिटायरमेंट का खर्च कैसे उठे। सवाल यह है कि क्या लोग 70 पर भी कमाने लायक रहेंगे, और अगर नहीं रहे तो उन्हें कौन संभालेगा।
हेल्थकेयर को बढ़ी हुई बीमारी का इलाज करने से हटकर उसे जल्दी पकड़ने की तरफ जाना होगा। यह बदलाव भारत के लिए उस देश से कहीं बड़ा है जहाँ सबके लिए प्राथमिक इलाज मौजूद है।
ये भविष्य के दार्शनिक सवाल नहीं हैं। ये नीति की वे बहसें हैं जो अभी चल रही हैं।
आप आज क्या कर सकते हैं
इसमें से किसी चीज़ के लिए किसी इलाज का इंतज़ार नहीं करना है।
रोज़ चलिए, और हफ्ते में दो बार ताकत वाली एक्सरसाइज़ जोड़िए — अपने शरीर के वजन से, रेज़िस्टेंस बैंड से, जो भी मिले उससे। मांसपेशी ही वह पूँजी है जो तय करेगी कि 75 पर आप अपने दम पर हैं या नहीं।
पर्याप्त प्रोटीन खाइए। ज़्यादातर भारतीय शाकाहारी थाली में इसका मतलब है जानबूझकर ध्यान देना। दाल, दही, पनीर, सोया, अंडा जहाँ चलता हो, और रोज़ एक ही फली के बजाय कई तरह की फलियाँ।
सात से आठ घंटे सोइए, और लगभग एक ही समय पर।
बीपी, फास्टिंग शुगर या HbA1c, और लिपिड प्रोफाइल की जाँच तीस की उम्र से कराइए, पचास से नहीं। और पहली गड़बड़ रिपोर्ट पर ही कदम उठाइए, तीसरी पर नहीं।
अगर आप 60 पार हैं तो डॉक्टर से फ्लू, न्यूमोकॉकल और हर्पीज़ ज़ोस्टर की वैक्सीन के बारे में पूछिए। भारत में यह लगभग कोई नहीं कराता, और आत्मनिर्भरता बचाने के सबसे सस्ते तरीकों में से यह एक है।
60 के बाद किसी न किसी रूप में काम, मकसद या समाज से जुड़े रहिए। ऐसा रिटायरमेंट जो आदमी की भूमिका छीन ले, सिर्फ पैसे की घटना नहीं है, सेहत की भी है।
और हर एंटी-एजिंग प्रोडक्ट से एक ही सवाल पूछिए — यह किस ट्रायल पर टिका है, और वह ट्रायल किन लोगों पर हुआ था?
रिवर्स एजिंग सीरीज़
लंबी और सेहतमंद ज़िंदगी असल में क्या बदल देगी — दस लेखों की सीरीज़।
- क्या इंसान का बुढ़ापा पलट सकता है? रिवर्स एजिंग की साइंस — बुढ़ापे की जीवविज्ञान, और अब तक सचमुच क्या पलटा जा सका है
- क्या हम सचमुच 100 पार जिएंगे और जवान भी रहेंगे? — उम्र, सेहत वाले साल, और सबूत क्या कहते हैं (आप यहाँ हैं)
- अगर बुढ़ापा धीमा हुआ तो क्या रिटायरमेंट बचेगा? — काम, पेंशन और सौ साल की ज़िंदगी
- क्या लंबी उम्र युवा पीढ़ी की नौकरियाँ छीन लेगी?
- अगर माता-पिता 90 साल तक स्वस्थ रहें, तो क्या बच्चों की ज़िम्मेदारी कम हो जाएगी?
- क्या एक ही जीवन में हम दो या तीन करियर करेंगे?
- क्या साइंस सचमुच 80 को नया 40 बना सकती है?
- फ़ायदा किसे मिलेगा — सबको, या सिर्फ़ अमीरों को?
- लंबी उम्र की अर्थव्यवस्था
- इंसान होने का भविष्य
खास बातें
कोई जादुई फॉर्मूला नहीं है। और भारत में जो चीज़ इस नाम पर बिकती है, वह खाने की तरह नियंत्रित होती है, दवा की तरह नहीं। यानी किसी ने जाँचा ही नहीं कि वह काम करती है या नहीं।
भारत की समस्या उम्र नहीं, सेहतमंद उम्र है। हमने तीस साल जोड़े, और हममें से बहुत लोग साठ पर पहले से शुगर या दिल की बीमारी लेकर पहुँचते हैं। इसीलिए तीस की उम्र से बचाव यहाँ विदेशी सलाह से ज़्यादा मायने रखता है।
जैविक उम्र के टेस्ट और CGM रिटेल में बिकते रिसर्च औज़ार हैं। ट्रेंड शायद कुछ बताए, एक रीडिंग नहीं। और दोनों में से कोई भी यह नहीं बदलेगा कि आपको करना क्या चाहिए।
हर लंबी जीने वाली आबादी में जो आदतें मिलती हैं, वही शहरी भारत लगातार छोड़ता जा रहा है। रोज़ की शारीरिक मेहनत, सब्जी-दाल वाली थाली, बड़ा परिवार, मोहल्ला। और ऐसी भूमिका जो 60 पर खत्म न हो।
जीन एडिटिंग ने सिकल सेल बीमारी और बीटा थैलेसीमिया का असली इलाज दिया है। दोनों भारत में आम हैं। यहाँ अड़चन कीमत और पहुँच है, साइंस नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. उम्र और सेहतमंद उम्र में क्या फर्क है?
उम्र यानी आप कितने साल जिए। सेहतमंद उम्र यानी उनमें से कितने साल आप शरीर और दिमाग से ठीक रहे, बिना बड़ी बीमारी या अपंगता के। भारत ने उम्र बहुत जोड़ी है और सेहतमंद उम्र कहीं कम। यही फासला इस लेख का विषय है।
2. शुगर है तो क्या उपवास सुरक्षित है?
अपने आप नहीं। अगर आप इंसुलिन या सल्फोनिलयूरिया लेते हैं, तो डोज़ बदले बिना उपवास खतरनाक रूप से शुगर गिरा सकता है। भारत में त्योहारों के उपवास के आसपास यह आम इमरजेंसी है। उपवास से पहले डॉक्टर से बात कीजिए, बाद में नहीं।
3. क्या ब्लू ज़ोन साइंस से साबित हैं?
कुछ ब्लू ज़ोन में सौ पार वालों की गिनती पर सवाल उठे हैं, क्योंकि पुराने जन्म रिकॉर्ड भरोसेमंद नहीं थे। पर उनसे जुड़ी आदतों — सब्जी-दाल वाली थाली, रोज़ चलना, घनिष्ठ समाज और मकसद — के अपने अलग और मजबूत सबूत हैं। किसी भारतीय आबादी पर ऐसी स्टडी नहीं हुई।
4. भारत में बिकने वाले लॉन्जेविटी सप्लीमेंट क्या सचमुच काम करते हैं?
किसी सप्लीमेंट के बारे में यह नहीं दिखा है कि वह इंसान की सेहतमंद उम्र बढ़ाता हो। भारत में ये न्यूट्रास्युटिकल के नाम पर बिकते हैं और FSSAI इन्हें खाने की तरह देखता है। यानी कानूनी रूप से बिकने का असर से कोई रिश्ता नहीं। आदतों के सबूत डिब्बे से कहीं मजबूत हैं।
5. क्या भारत में जैविक उम्र के टेस्ट कराने चाहिए?
ये रिटेल में बिकते रिसर्च औज़ार हैं। एक ही आदमी के लिए अलग-अलग क्लॉक अलग जवाब देते हैं। एक रीडिंग बहुत कम बताती है। और नतीजा नींद, चलने-फिरने, खाने और शुगर के बारे में आपकी सलाह नहीं बदलेगा।
6. क्या सिकल सेल का CRISPR इलाज भारत में मिलता है?
Casgevy अमेरिका और कुछ और देशों में सिकल सेल बीमारी और ट्रांसफ्यूज़न पर निर्भर बीटा थैलेसीमिया के लिए मंज़ूर है। दोनों भारत में आम हैं और National Sickle Cell Anaemia Elimination Mission का केंद्र हैं। पर इसकी कीमत इसे आज के आम भारतीय इलाज से बहुत दूर रखती है।
7. भारत में जाँच किस उम्र से शुरू करनी चाहिए?
विदेशी सलाह से पहले। यहाँ मेटाबॉलिक बीमारी जल्दी शुरू होती है, इसलिए तीस की उम्र से बीपी, फास्टिंग शुगर या HbA1c और लिपिड प्रोफाइल ठीक रहते हैं। कोई भी मान्यता प्राप्त लैब बिना पर्चे के ये कर देती है।
संक्षेप शब्द
- APOE: Apolipoprotein E
- CGM: Continuous Glucose Monitor
- CRISPR: Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats
- DNA: Deoxyribonucleic acid
- FOXO3: Forkhead Box O3
- FSSAI: Food Safety and Standards Authority of India
- HbA1c: Glycated haemoglobin
- ICMR: Indian Council of Medical Research
- LASI: Longitudinal Ageing Study in India
- NAD: Nicotinamide Adenine Dinucleotide
- NMN: Nicotinamide Mononucleotide
- NR: Nicotinamide Riboside
- SCD: Sickle Cell Disease
- TDT: Transfusion-Dependent Beta Thalassaemia
संदर्भ
- International Institute for Population Sciences. Longitudinal Ageing Study in India (LASI), Wave 1. Mumbai: IIPS; 2020.
- Anjana RM, et al. Metabolic Non-Communicable Disease Health Report of India: the ICMR-INDIAB National Cross-Sectional Study. The Lancet Diabetes and Endocrinology. 2023.
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- Ministry of Health and Family Welfare, Government of India. National Sickle Cell Anaemia Elimination Mission. Launched July 2023.
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- Kreouzi M, Theodorakis N, Constantinou C. Lessons Learned From Blue Zones, Lifestyle Medicine Pillars and Beyond. American Journal of Lifestyle Medicine. 2024.
- Food Safety and Standards Authority of India. Food Safety and Standards (Health Supplements, Nutraceuticals, Food for Special Dietary Use) Regulations, 2016.
अस्वीकरण
यह लेख सिर्फ आम जानकारी के लिए है और डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं लेता। जाँच, दवा, उपवास या बुढ़ापे के नाम पर बिकने वाली किसी भी थेरेपी का फैसला ऐसे योग्य डॉक्टर के साथ लीजिए जो आपकी मेडिकल हिस्ट्री जानता हो।