
इस सीरीज़ के बारे में। रिवर्स एजिंग दस भागों की सीरीज़ है — बुढ़ापे की साइंस आज क्या कर सकती है, क्या अभी नहीं कर सकती, और लंबी व सेहतमंद ज़िंदगी का काम, पैसे और परिवार पर क्या असर होगा। यह भाग 1 है: खुद साइंस — बुढ़ापा है क्या, और उसका कितना हिस्सा पलटा जा सकता है।
1950 में भारत में पैदा हुआ बच्चा औसतन 41 साल जीता था। आज पैदा हुआ बच्चा करीब 72 साल जिएगा।
यह इस देश की सेहत की सबसे बड़ी कामयाबी है। लेकिन इसका बुढ़ापे को धीमा करने से कोई लेना-देना नहीं था। ये साल ज़िंदगी की शुरुआत में जीते गए, आखिर में नहीं — वैक्सीन, एंटीबायोटिक, साफ पानी और बच्चों की मौत घटने से।
असली सवाल अब आता है, जिस पर साइंटिस्ट काम कर रहे हैं। क्या हम दूसरे सिरे पर भी साल जोड़ सकते हैं?
एक नज़र में
बुढ़ापा कोई एक चीज़ का घिस जाना नहीं है। यह शरीर में होने वाले कई बदलावों का सेट है, जिन्हें नापा जा सकता है। रिसर्चर अभी ऐसे बारह बदलाव गिनाते हैं। ये आपस में जुड़े हैं, इसलिए किसी एक का कोई एक इलाज नहीं है।
आज कोई भी इलाज इंसान का बुढ़ापा पलट नहीं सकता। चूहों में कुछ निशानियाँ ज़रूर पलटी गई हैं। 2020 की एक Nature स्टडी में बूढ़े चूहों की खोई हुई नज़र वापस आ गई थी। इंसानों में ऐसा कुछ नहीं हुआ है।
भारत के लिए यह बात बाकी देशों से ज़्यादा मायने रखती है। हमने ज़िंदगी में तीस साल से ज़्यादा जोड़े, पर उतने सेहतमंद साल नहीं जोड़ पाए। यही वजह है कि यहाँ 60 साल के कितने ही लोग पहले से शुगर या दिल की बीमारी संभाल रहे होते हैं।
जो चीज़ें सचमुच बुढ़ापे को धीमा करती हैं, वे बोरिंग और सस्ती हैं। नींद, रोज़ की वॉक, तंबाकू से दूरी, और शुगर व बीपी काबू में। जो भी चीज़ आपको एंटी-एजिंग इलाज कहकर बेची जा रही है, वह अपने सबूत से आगे चल रही है।
बुढ़ापा इतना नुकसानदेह है, तो कुदरत ने इसे रोका क्यों नहीं?
कुदरत उसी चीज़ का साथ देती है जो आपको जवानी में ज़िंदा रखे और बच्चे पैदा करने लायक बनाए। जीन उसी उम्र में आगे जाते हैं।
उसके बाद उसकी पकड़ ढीली पड़ जाती है। सेल में नुकसान जमा होता रहता है, क्योंकि उसे रोकने वाला कोई दबाव नहीं बचता।
यानी बुढ़ापा कुदरत की नाकामी नहीं है। यह उसी चीज़ का नतीजा है जिसके लिए कुदरत काम कर रही थी। चालीस के बाद हम उसकी प्राथमिकता में थे ही नहीं।
तो क्या इंसान का बूढ़ा होना अब बंद होने वाला है?
नहीं।
लेकिन पिछले बीस साल में एक चीज़ ज़रूर बदली। रिसर्चर ने बुढ़ापे को एक तय पर्दा मानना छोड़ दिया। अब वे इसे एक प्रोसेस मानते हैं। इसके हिस्सों को नाम दिया जा सकता है, नापा जा सकता है, और शायद बदला भी जा सकता है।

यह सवाल भारत में सबसे ज़्यादा क्यों मायने रखता है
भारत सेहतमंद होने से तेज़ रफ्तार में बूढ़ा हो रहा है। और आंकड़े धीरे-धीरे नहीं बढ़ रहे।
UNFPA की India Ageing Report 2023 कहती है कि 2050 तक 60 साल से ऊपर के लोग आबादी का 20% से ज़्यादा होंगे। यह आज के करीब दोगुना है।
2046 तक भारत में 60 पार के लोग 15 साल से कम उम्र वालों से ज़्यादा हो जाएंगे। सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला हिस्सा 80 पार वालों का है। 2022 से 2050 के बीच इसमें करीब 279% बढ़त का अनुमान है।
अब इसके साथ ICMR-INDIAB सर्वे रखिए, जो 2023 में The Lancet Diabetes and Endocrinology में छपा। इसमें 10.1 करोड़ भारतीयों को डायबिटीज़ मिली, यानी करीब 11.4% बड़े लोग। प्री-डायबिटीज़ वालों की गिनती इससे भी बड़ी थी।
भारतीयों को शुगर और दिल की बीमारी यूरोप के लोगों से कम उम्र में, और कम वजन पर होती है। यहाँ का दुबला 45 साल का आदमी लंदन के भारी 55 साल वाले से जैविक रूप से बूढ़ा हो सकता है।
इन तीनों बातों को जोड़िए तो तस्वीर असहज है। हमारे यहाँ बुज़ुर्गों की बहुत बड़ी आबादी आने वाली है, जिसने बीमारियाँ जमा करना बहुत पहले शुरू कर दिया था। अगर जैविक बुढ़ापा धीमा किया जा सका, तो भारत को इसका फायदा बाकी देशों से ज़्यादा होगा। वजह सीधी है — हम सेहतमंद साल बाकी देशों से ज़्यादा गंवा रहे हैं।
क्या बुढ़ापे का ही इलाज हो सकता है? क्या बुढ़ापा एक बीमारी है?
सदियों तक बुढ़ापा वह चीज़ था जिसे लोग मान लेते थे, इलाज की चीज़ नहीं समझते थे। अब यह सोच बदल रही है। दलील यह है कि अगर आप बुढ़ापे की जड़ वाली बायोलॉजी पर काम करें, तो शायद कई बीमारियाँ एक साथ टल जाएं। एक-एक बीमारी के आने के बाद उसका इलाज करने से यह बेहतर है।
बुढ़ापे को सरकारी तौर पर बीमारी नहीं माना गया है। लेकिन यहाँ ज़िंदगी छोटी करने वाली ज़्यादातर बीमारियों का सबसे बड़ा जोखिम यही है। दिल की बीमारी, ब्रेन स्ट्रोक, शुगर की परेशानियाँ, भूलने की बीमारी और कई तरह के कैंसर।
सुनने में यह क्रांतिकारी लगता है। पर कुदरत लाखों साल से शरीर दोबारा बनाती आई है।
एक्सोलोटल नाम की मैक्सिको की छोटी सैलामैंडर पूरा पैर दोबारा उगा लेती है। दिल का हिस्सा, रीढ़ की नस, यहाँ तक कि दिमाग के हिस्से भी।
ग्रीनलैंड शार्क करीब 400 साल जीती है, रीढ़ वाले जानवरों में सबसे लंबी। नेकेड मोल रैट नाम के चूहे को कैंसर लगभग होता ही नहीं।
इंसान में इनमें से कुछ नहीं है। फिर भी हम खाली हाथ नहीं हैं।
लिवर इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। इसका हिस्सा काट दीजिए, यह दोबारा बढ़ जाता है। लिवर ट्रांसप्लांट में ज़िंदा डोनर की पूरी बात इसी पर टिकी है। मरम्मत की मशीनरी हमारे अंदर पहले से है। सवाल यह है कि क्या इसे चोट की जगह बुढ़ापे की तरफ मोड़ा जा सकता है।
बुढ़ापा सिर्फ जन्मदिन गिनना नहीं है
किसी से उम्र पूछिए तो एक नंबर मिलता है। बत्तीस। अट्ठावन। चौहत्तर।
यह क्रोनोलॉजिकल उम्र है। यह सिर्फ जन्मदिन गिनती है, और कुछ नहीं। जैविक उम्र यह बताती है कि शरीर असल में कितने साल का बर्ताव कर रहा है।
एक ही कॉलोनी के दो 60 साल के लोगों को सोचिए।
एक रोज़ सुबह वॉक करता है, बीपी नॉर्मल है, शुगर नहीं है, अपने काम खुद निपटा लेता है।
दूसरे को पंद्रह साल से शुगर है और दिन में चार गोलियाँ चलती हैं। सीढ़ी चढ़ते ही साँस फूलती है, और बाहर निकलना लगभग बंद है।
कागज़ पर दोनों की उम्र एक है। शरीर के हिसाब से नहीं। इन दोनों के बीच का फासला ही इस लेख का विषय है।
आपके आधार कार्ड पर 50 लिखा हो सकता है, जबकि शरीर चालीस का लगे, या साठ का।
इसी एक सोच ने बुढ़ापे की रिसर्च बदल दी। बुढ़ापा एक ऐसी उलटी गिनती नहीं रहा जिससे बहस न हो सके। वह ऐसी प्रोसेस बन गया जिसे नापा और शायद बदला जा सके।
इसका मतलब यह नहीं कि बुढ़ापे की गुत्थी सुलझ गई। मतलब सिर्फ इतना है कि यह अब किस्मत की बात नहीं, साइंस का सवाल है।
उम्र बढ़ने पर शरीर के अंदर होता क्या है?
ज़्यादातर लोगों के दिमाग में झुर्रियाँ, सफेद बाल और अकड़े घुटने आते हैं। ये दिखने वाली निशानियाँ हैं, और ये देर से आती हैं।
असली कहानी बहुत गहरे शुरू होती है — उन खरबों सेल में जो आपको ज़िंदा रखने के लिए चौबीसों घंटे काम करते हैं।
बुढ़ापे की बारह निशानियाँ
रिसर्चर इस पूरी प्रोसेस को बुढ़ापे के हॉलमार्क कहते हैं। ये आपस में जुड़े बदलाव हैं जो शरीर के अलग-अलग अंगों में दिखते हैं।
जवानी में मरम्मत का सिस्टम शानदार होता है। सेल बंटते हैं, DNA की मरम्मत होती है, घिसे-पिटे प्रोटीन रीसायकल हो जाते हैं।
समय के साथ यह सिस्टम सुस्त और लापरवाह होता जाता है। छोटी-छोटी गलतियाँ जमा होती हैं। अकेले वे कुछ नहीं। मिलकर वे शरीर का काम करने का तरीका बदल देती हैं।
DNA का नुकसान सबसे पहले शुरू होता है। धूप, प्रदूषण, इन्फेक्शन और रोज़ की मेटाबॉलिज़्म हर दिन DNA पर चोट करते हैं। सेल के पास इसकी अच्छी मरम्मत व्यवस्था है। पर पुरानी गाड़ी चलाते मैकेनिक की तरह, वक्त के साथ यह कमज़ोर पड़ती है।
फिर आते हैं माइटोकॉन्ड्रिया, जो हर अंग को चलाने वाली एनर्जी बनाते हैं। इनकी कार्यक्षमता गिरती है तो एनर्जी घटती है और नुकसानदेह कचरा बढ़ता है, जिसे रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज़ कहते हैं।
सेल्युलर सेनेसेंस एक और निशानी है। इन्हें आम भाषा में ज़ॉम्बी सेल कहा जाता है।
काम खत्म होने पर मरने के बजाय ये टिके रहते हैं। ये सूजन बढ़ाने वाले केमिकल छोड़ते हैं, जो पड़ोस के अच्छे सेल को नुकसान पहुँचाते हैं। माना जाता है कि इनका जमा होना उम्र से जुड़ी कई बीमारियों को हवा देता है।
बुढ़ापा स्टेम सेल पर भी असर डालता है, जो शरीर की मरम्मत टीम हैं। जवानी में ये खराब टिशू जल्दी बदल देते हैं। उम्र के साथ इनकी गिनती और फुर्ती दोनों घटती हैं, और चोट से उबरने में ज़्यादा वक्त लगता है।
आखिर में है इन्फ्लेमेजिंग — हल्की सूजन जो दशकों तक चुपचाप बनती रहती है। यह वह काम की सूजन नहीं है जो इन्फेक्शन से लड़ती है। यह टिकी रहने वाली सूजन है। रिसर्च में इसका रिश्ता दिल की बीमारी, शुगर, अल्ज़ाइमर और गठिया से जुड़ा मिला है।
यह सब एक के बाद एक नहीं होता। ये प्रोसेस एक-दूसरे को बढ़ाती हैं, और मिलकर शरीर को लगातार कमज़ोर बनाती जाती हैं।
दशकों तक मेडिसिन इस चेन के आखिरी सिरे पर बैठी बीमारियों का इलाज करती रही। अब सवाल यह है कि क्या बहुत पहले दखल दिया जा सकता है।

क्या बूढ़े सेल दोबारा जवान हो सकते हैं?
जिस खोज ने पूरी बहस बदल दी, वह एक अनपेक्षित दिशा से आई।
2006 में जापानी साइंटिस्ट शिन्या यामानाका ने दिखाया कि किसी बड़े सेल में चार जीन डालकर उसे स्टेम सेल जैसी हालत में लौटाया जा सकता है। ये जीन थे Oct4, Sox2, Klf4 और c-Myc। छह साल बाद इसके लिए उन्हें मेडिसिन का नोबेल मिला।
इन्हीं चार को अब यामानाका फैक्टर कहते हैं। इन्होंने साबित किया कि सेल का बूढ़ा होना एकतरफा रास्ता नहीं है।
एक पेच था। किसी पके हुए सेल को पूरी तरह पीछे ले जाने से उसकी पहचान मिट जाती है। स्किन का सेल स्किन की तरह काम करना छोड़ देता है। लिवर का सेल लिवर की तरह। यह कैंसर का असली खतरा है, कागज़ी नहीं।
इसलिए सवाल बेहतर हो गया।
अगर सिर्फ आधा रास्ता पीछे लौटें तो?
सेल को शुरुआत तक ले जाने के बजाय रिसर्चर ने पार्शियल रीप्रोग्रामिंग आज़माना शुरू किया। यानी बूढ़े सेल को जवानी की तरफ थोड़ा धकेलना, पर उसका काम उससे न छीनना।
पुरानी पेंटिंग की सफाई की तरह सोचिए। आप दशकों की धूल हटाते हैं। तस्वीर दोबारा नहीं बनाते।
यह सोच आज इस पूरे क्षेत्र का सबसे सक्रिय हिस्सा है।
वे जानवरों के प्रयोग जिन्होंने पूरा क्षेत्र बदल दिया
उम्र पलटने के सबसे मजबूत सबूत इंसानों से नहीं आए। वे चूहों से आए।
दो स्टडी ने सबसे ज़्यादा काम किया। 2016 में ओकाम्पो और उनके साथियों ने Cell में बताया कि पार्शियल रीप्रोग्रामिंग से चूहों में बुढ़ापे की कई निशानियाँ घट गईं। 2020 में लू और उनके साथियों ने Nature में बताया कि बूढ़े चूहों की उम्र के साथ खोई नज़र वापस आ गई।
दूसरे प्रयोगों में मांसपेशी, मेटाबॉलिज़्म और टिशू की मरम्मत में सुधार दिखा। बुढ़ापे के रास्तों पर काम करने वाली कई चीज़ों ने लैब के जानवरों की उम्र भी बढ़ाई। उन्हें अमर बनाकर नहीं, बल्कि ज़्यादा समय तक सेहतमंद रखकर।
इन नतीजों ने वाकई इस क्षेत्र को बदला। इनके साथ एक चेतावनी भी आती है, जो सुर्खियों में नहीं छपती।
चूहा इंसान नहीं होता।
चूहे दो-तीन साल जीते हैं, उनका इम्यून सिस्टम अलग है, और दवा पर उनका असर हमसे मेल नहीं खाता। कितनी ही दवाएँ चूहों में कमाल करके इंसानों में फेल हो जाती हैं। इंसानी शरीर ज़्यादा उलझा हुआ है और इंसानी ट्रायल बहुत लंबे चलते हैं।
इसलिए रिसर्चर एक साथ उत्साहित भी हैं और सतर्क भी। सबूत असली हैं। चूहे से इंसान के सुरक्षित इलाज तक की छलांग अब भी मेडिसिन की सबसे कठिन समस्याओं में है।
क्या किसी इंसान का बुढ़ापा अब तक पलटा है?
यहीं सुर्खियाँ साइंस से आगे निकल जाती हैं।
अगर आपने कहीं पढ़ा हो कि साइंटिस्ट ने बुढ़ापा पलट दिया या जवानी का चश्मा खोज लिया, तो हेडलाइन से आगे पढ़िए।
किसी ने नहीं दिखाया कि इंसान का बुढ़ापा पलटा जा सकता है। इतना ज़रूर दिखा है कि खास हालात में बुढ़ापे की कुछ जैविक निशानियाँ हिलती हैं।
इसका मुख्य औज़ार एपिजेनेटिक क्लॉक है। ये टेस्ट DNA पर लगे केमिकल निशान पढ़ते हैं, जिन्हें DNA मिथाइलेशन कहते हैं, और उस पैटर्न से जैविक उम्र का अंदाज़ा लगाते हैं। डाइट, एक्सरसाइज़ और स्ट्रेस पर हुई छोटी स्टडी में इस नंबर में हल्का सुधार बताया गया है।
अब वह फर्क समझिए जो असल में मायने रखता है। एपिजेनेटिक क्लॉक पर कम नंबर का मतलब यह नहीं कि आदमी लंबा जिएगा या बीमारी से बचेगा। इसका जवाब सिर्फ बड़े और लंबे ट्रायल दे सकते हैं, जो अब तक हुए नहीं।
इंसानों पर शुरुआती सेफ्टी स्टडी शुरू हुई हैं। ये यह जाँचने के लिए बनी हैं कि चीज़ सुरक्षित है या नहीं, यह साबित करने के लिए नहीं कि वह काम करती है।
साइंस में उम्मीद और सबूत एक चीज़ नहीं होते। इन्हीं दो शब्दों के बीच की जगह में इस वक्त सबसे ज़्यादा पैसा कमाया जा रहा है।

यह काम कर कौन रहा है, और हमारे लिए इसका मतलब क्या है
लॉन्जेविटी साइंस मेडिकल रिसर्च का सबसे तेज़ी से बढ़ता हिस्सा बन चुका है। और इसमें से लगभग कुछ भी यहाँ नहीं हो रहा।
Altos Labs, गूगल की मदद से चलने वाली Calico, और Retro Biosciences बुनियादी बायोलॉजी पर बहुत बड़ा पैसा लगा रही हैं। दुनिया भर की यूनिवर्सिटी लैब सेनोलिटिक दवाओं, स्टेम सेल, रीप्रोग्रामिंग और जीन एडिटिंग पर काम कर रही हैं।
कोई तय रोडमैप नहीं है। कुछ रिसर्चर मानते हैं कि सेनेसेंट सेल हटाना सबसे अहम होगा। कुछ माइटोकॉन्ड्रिया पर काम कर रहे हैं, कुछ स्टेम सेल पर, और कुछ ऐसी दवाओं पर जो एक साथ कई रास्तों पर असर करें।
भारतीय पाठक के लिए इसका सीधा मतलब है। हम इन इलाजों के बनाने वाले नहीं, खरीदने वाले होंगे। यानी ये यहाँ देर से आएंगे, डॉलर में कीमत लेकर आएंगे, और शायद पहले बड़े शहरों के प्राइवेट अस्पतालों में आएंगे।
यह साफ कहना ज़रूरी है। किसी इलाज के बन जाने और यहाँ सस्ता होने के बीच का फासला अक्सर सालों में नापा जाता है, कभी-कभी दशकों में।
उम्र पलटना अब भी इतना मुश्किल क्यों है
अगर बूढ़े सेल को जवान जैसा बनाया जा सकता है, तो यह अस्पताल में क्यों नहीं है?
क्योंकि बायोलॉजी शायद ही कभी आसान होती है।
बुढ़ापा कोई एक खराब जीन या एक घिसा हुआ अंग नहीं है। यह दर्जनों जुड़ी हुई प्रोसेस हैं जो दशकों तक चलती हैं। एक रास्ते को धकेलिए तो दूसरा हिल जाता है, कभी-कभी गलत दिशा में।
सबसे बड़ी चिंता कैंसर है। खराब हो जाने पर सेल को बंटना बंद कर देना चाहिए। उन्हें बिना बहुत सावधानी के जवान बनाइए, तो हो सकता है वे तब भी बंटने लगें जब उन्हें नहीं बंटना चाहिए।
फिर वक्त की समस्या है। ज़्यादातर पुरानी बीमारियाँ आने में दशकों लेती हैं। इसलिए किसी एंटी-एजिंग इलाज को साबित करने के लिए लोगों को बहुत लंबे समय तक देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि यह क्षेत्र मेडिसिन के बाकी हिस्सों से धीमा चलता है।
कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अकेली मेडिसिन नहीं दे सकती। क्या बुढ़ापे को बीमारी माना जाए? ये इलाज सबसे पहले किसे मिलें? जिस देश में इलाज का बड़ा खर्च आज भी घर की जेब से जाता है, वहाँ “कौन खरीद पाएगा” कोई किताबी सवाल नहीं है।
भारत में इस वक्त क्या बेचा जा रहा है, और किससे बचें
इस विषय पर लिखे ज़्यादातर लेख यही हिस्सा छोड़ देते हैं।
यहाँ एंटी-एजिंग इलाज बेचने का बाज़ार पहले से चल रहा है, और उसका बड़ा हिस्सा सबूत से बहुत आगे भाग रहा है। क्लीनिक जोड़ों, बालों, स्किन और आम “कायाकल्प” के लिए स्टेम सेल इंजेक्शन देते हैं। IV ड्रिप को सेल की मरम्मत बताकर बेचा जाता है। सप्लीमेंट ब्रांड लॉन्जेविटी रिसर्च की भाषा उधार ले लेते हैं, पर उसकी सावधानी नहीं।
भारत के अपने नियम इस मार्केटिंग से कहीं ज़्यादा साफ हैं। ICMR की National Guidelines for Stem Cell Research इस पर सीधी हैं।
खून से जुड़ी तय बीमारियों के बाहर स्टेम सेल का इस्तेमाल जाँच के दायरे में है। यह मंज़ूर रिसर्च के अंदर होना चाहिए, सेवा बनाकर बेचा नहीं जाना चाहिए। ये गाइडलाइन इसीलिए बनीं, क्योंकि बिना सबूत वाला स्टेम सेल काम बहुत आम हो गया था।
तो पैसा खर्च करने से पहले तीन सवाल पूछिए। यह इलाज किस बीमारी के लिए मंज़ूर है? यह किस ट्रायल पर टिका है? और अगर क्लीनिक जवाब में सिर्फ लोगों की तारीफ दिखाए, तो शक कीजिए।
आज बिकने वाली कोई चीज़ इंसान का बुढ़ापा पलटती साबित नहीं हुई है। अगर हुई होती, तो उसका होर्डिंग नहीं लगाना पड़ता।
अगले दस से बीस साल कैसे दिख सकते हैं?
इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता, पर दिशा साफ है।
पहली पीढ़ी के इलाज बुढ़ापा पलटने के बजाय उसे धीमा करने वाले होंगे। वे बीमारी का जोखिम घटाएंगे। सेनेसेंट सेल साफ करने वाली, माइटोकॉन्ड्रिया को सहारा देने वाली, या स्टेम सेल बचाने वाली दवाएँ असली उम्मीदवार हैं।
AI ऐसे मॉलिक्यूल खोजने की रफ्तार बढ़ा रहा है। बेहतर बायोमार्कर आ गए तो इलाज सबके लिए एक जैसा नहीं रहेगा, नाप-तौल कर दिया जा सकेगा।
कोई एक इलाज सब कुछ नहीं करेगा। दिल की सेहत बीपी, कोलेस्ट्रॉल, चलने-फिरने और खाने पर एक साथ टिकी है। सेहतमंद बुढ़ापा भी लगभग तय है कि इसी तरह काम करेगा।
यह धीरे-धीरे आएगा, और सब तक बराबर नहीं आएगा।
आप आज क्या कर सकते हैं
लॉन्जेविटी साइंस की सबसे काम की बात सबसे कम रोमांचक भी है।
आपको इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं। जिन चीज़ों के सबूत सबसे मजबूत हैं, वे आज मौजूद हैं और ज़्यादातर मुफ्त हैं।
रोज़ की वॉक मांसपेशी, दिमाग और मेटाबॉलिज़्म के लिए उससे ज़्यादा करती है जो कुछ भी बाज़ार में बिक रहा है। नींद वही वक्त है जब सेल की मरम्मत होती है।
दाल, सब्जी, फल और मोटे अनाज पर टिकी थाली शरीर की पुरानी सूजन घटाती है। मैदा, चीनी और तली चीज़ों में कटौती भी। साथ, काम और मकसद का असर नापा जा चुका है। इसीलिए रिटायरमेंट सेहत की छोटी घटना नहीं है।
दो चीज़ें यहाँ विदेशी सलाह से पहले करनी चाहिए, क्योंकि यहाँ मेटाबॉलिक बीमारी जल्दी शुरू होती है।
शुगर, बीपी और लिपिड प्रोफाइल की जाँच पचास के बजाय तीस की उम्र से शुरू कीजिए। कोई भी मान्यता प्राप्त लैब तीनों सस्ते में कर देती है, और इसके लिए पर्चे की ज़रूरत नहीं। और फास्टिंग शुगर बढ़ती दिखे तो उसे पहली बार में गंभीरता से लीजिए, तीसरी बार में नहीं।
जैविक उम्र के टेस्ट प्राइवेट लैब में मिलते हैं। ये दिलचस्प ज़्यादा हैं, काम के कम। आम इलाज में इनकी जगह अभी तय हो रही है, और इनका नंबर आपकी रोज़ की आदतों के बारे में कुछ नहीं बदलता।
साइंस वाकई रोमांचक है। पर आपकी रोज़ की आदतें आज भी सबसे मजबूत सबूत वाला एंटी-एजिंग औज़ार हैं।
रिवर्स एजिंग सीरीज़
लंबी और सेहतमंद ज़िंदगी असल में क्या बदल देगी — दस लेखों की सीरीज़।
- क्या इंसान का बुढ़ापा पलट सकता है? रिवर्स एजिंग की साइंस — बुढ़ापे की जीवविज्ञान, और अब तक सचमुच क्या पलटा जा सका है (आप यहाँ हैं)
- क्या हम सचमुच 100 पार जिएंगे और जवान भी रहेंगे? — उम्र, सेहत वाले साल, और सबूत क्या कहते हैं
- अगर बुढ़ापा धीमा हुआ तो क्या रिटायरमेंट बचेगा? — काम, पेंशन और सौ साल की ज़िंदगी
- क्या लंबी उम्र युवा पीढ़ी की नौकरियाँ छीन लेगी?
- अगर माता-पिता 90 साल तक स्वस्थ रहें, तो क्या बच्चों की ज़िम्मेदारी कम हो जाएगी?
- क्या एक ही जीवन में हम दो या तीन करियर करेंगे?
- क्या साइंस सचमुच 80 को नया 40 बना सकती है?
- फ़ायदा किसे मिलेगा — सबको, या सिर्फ़ अमीरों को?
- लंबी उम्र की अर्थव्यवस्था
- इंसान होने का भविष्य
खास बातें
आज कोई इलाज इंसान का बुढ़ापा नहीं पलटता। जो भी चीज़ इस नाम पर बिक रही है, वह अपने सबूत से आगे है। पार्शियल रीप्रोग्रामिंग ने चूहों में कुछ निशानियाँ ज़रूर पलटी हैं, पर इंसानों में ऐसा कुछ नहीं दिखा। चूहे का नतीजा इंसान का नतीजा नहीं होता।
भारत के पास इसकी खास वजह है। हम तेज़ी से बूढ़े हो रहे हैं। 2050 तक 60 पार के लोग देश का पाँचवाँ हिस्सा से ज़्यादा होंगे। और हममें से बहुत लोग उससे दशकों पहले बीमारियाँ जमा करना शुरू कर देते हैं।
जो आज काम करता है, वह चमकदार नहीं है और अभी मौजूद है। रोज़ चलना, पूरी नींद, ऐसी थाली जो मैदा और चीनी पर न टिकी हो, तंबाकू से पूरी दूरी। और तीस की उम्र से ही शुगर व बीपी काबू में रखना।
भारत में किसी भी एंटी-एजिंग इलाज पर पैसा देने से पहले दो सवाल पूछिए। यह किस बीमारी के लिए मंज़ूर है? और किस ट्रायल पर टिका है? खून से जुड़ी तय बीमारियों के बाहर स्टेम सेल थेरेपी ICMR की अपनी गाइडलाइन में जाँच के दायरे में है, क्लीनिक चाहे जो कहे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या बुढ़ापा सचमुच पलटा जा सकता है?
इंसानों में नहीं। रिसर्चर ने सेल और चूहों में उम्र से जुड़े कुछ बदलाव ज़रूर पलटे हैं। पर इंसानों में सुरक्षित और असरदार तरीके से उम्र पलटना अब तक नहीं दिखाया गया।
2. जैविक उम्र क्या है, और यह मेरी असली उम्र से अलग कैसे है?
क्रोनोलॉजिकल उम्र आपके जन्मदिन गिनती है। जैविक उम्र यह अंदाज़ा है कि आपके सेल और अंग असल में कितनी अच्छी तरह काम कर रहे हैं। यह आधार कार्ड के नंबर से ज़्यादा भी हो सकती है और कम भी।
3. भारत में बिकने वाले जैविक उम्र के टेस्ट कराने चाहिए?
ये दिलचस्प ज़्यादा हैं, काम के कम। रोज़ के इलाज में इनकी जगह अभी तय हो रही है। नतीजा जो भी आए, नींद, चलने-फिरने, खाने, शुगर और बीपी के बारे में आपकी सलाह वही रहेगी।
4. यामानाका फैक्टर क्या हैं?
चार जीन, जिन्हें शिन्या यामानाका ने 2006 में पहचाना। ये लैब में किसी पके हुए सेल को स्टेम सेल जैसी हालत में लौटा सकते हैं। इस खोज को 2012 में नोबेल मिला और यही रीप्रोग्रामिंग रिसर्च की बुनियाद है।
5. सेनोलिटिक क्या होते हैं?
प्रयोग के दौर की ऐसी दवाएँ जो सेनेसेंट सेल हटाने के लिए बनी हैं। ये वही ज़ॉम्बी सेल हैं जो बंटना बंद कर देते हैं पर टिके रहकर सूजन वाले केमिकल छोड़ते हैं। ये अभी ट्रायल में हैं, मंज़ूर इलाज नहीं हैं।
6. क्या भारत में एंटी-एजिंग के लिए स्टेम सेल थेरेपी कानूनी है?
ICMR की National Guidelines for Stem Cell Research इसे जाँच के दायरे में रखती हैं। यह बात खून से जुड़ी तय बीमारियों के बाहर हर इस्तेमाल पर लागू है। यानी इसकी जगह मंज़ूर रिसर्च के अंदर है, कायाकल्प की सेवा बनाकर बेचने में नहीं। किसी भी क्लीनिक से पूछिए कि वह किस मंज़ूरी के तहत काम कर रहा है।
7. क्या मेरी ज़िंदगी में एंटी-एजिंग इलाज आ जाएगा?
शायद ऐसा कुछ आए जो बुढ़ापा धीमा करे, पलटे नहीं। बुढ़ापे के लिए मंज़ूर इलाज आज दुनिया में कहीं नहीं है। और जो भी आएगा, उसे भारत में आम आदमी की जेब तक पहुँचने में वक्त लगेगा।
संदर्भ
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- Yamanaka S. Nobel Prize Lecture: Induced Pluripotent Stem Cells. 2012.
- Ocampo A, et al. In Vivo Amelioration of Age-Associated Hallmarks by Partial Reprogramming. Cell. 2016.
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- Horvath S. DNA Methylation Age of Human Tissues and Cell Types. Genome Biology. 2013.
- Anjana RM, et al. Metabolic Non-Communicable Disease Health Report of India: the ICMR-INDIAB National Cross-Sectional Study. The Lancet Diabetes and Endocrinology. 2023.
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- United Nations, Department of Economic and Social Affairs. World Population Prospects 2024.
- Indian Council of Medical Research and Department of Biotechnology. National Guidelines for Stem Cell Research. 2017.
- World Health Organization. Decade of Healthy Ageing 2021-2030.
अस्वीकरण
यह लेख सिर्फ आम जानकारी के लिए है और डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं लेता। जाँच, इलाज या बुढ़ापे के नाम पर बिकने वाली किसी भी थेरेपी का फैसला ऐसे योग्य डॉक्टर के साथ लीजिए जो आपकी मेडिकल हिस्ट्री जानता हो।