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गांजा, चरस, भांग — भारत में छिपा कैनबिस संकट: नई रिसर्च क्या खतरे दिखाती है

छिपा कैनबिस संकट — भांग का पत्ता, माइक्रोस्कोप और भारत का नक्शा, गांजा-चरस-भांग पर रिसर्च

भांग के बारे में जो बात लोग नहीं बताते

हर होली पर भारत में लाखों लोग खुशी-खुशी भांग की ठंडाई पीते हैं। आखिर यह भगवान शिव से जुड़ी परंपरा मानी जाती है। इसे लगभग 3,000 साल से इस्तेमाल किया जा रहा है। तो फिर यह इतनी बुरी कैसे हो सकती है?

एक नज़र में

  • होली पर भांग की ठंडाई एक पुरानी परंपरा है — क़रीब 3,000 साल पुरानी और भगवान शिव से जुड़ी हुई।
  • लेकिन आज बाज़ार में जो मिल रहा है, वह वही चीज़ नहीं है। ताक़त और तरीक़ा दोनों बदल चुके हैं।
  • 2025–2026 की रिसर्च दिमाग़ पर पड़ने वाले असर की ओर इशारा करती है, और जोखिम युवाओं में सबसे ज़्यादा है।
  • बिना नियंत्रण वाले पैकेट में क्या है, यह किसी को नहीं पता — मात्रा भी नहीं, मिलावट भी नहीं।
  • वेपिंग भारत में नया और तेज़ी से बढ़ता रास्ता है। लेख में चेतावनी के संकेत और मदद कहाँ मिलेगी, दोनों दिए गए हैं।

लेकिन होली के न्योते में कोई यह नहीं लिखता: भारत में 3.1 करोड़ लोग अभी कैनबिस का इस्तेमाल कर रहे हैं — और उनमें से 72 लाख लोगों को इससे गंभीर दिक्कत हो चुकी है। nams-annals

यह कोई पश्चिमी देशों का आंकड़ा नहीं है जो किसी डॉक्यूमेंट्री से उठा लिया गया हो। यह सीधे AIIMS New Delhi और भारत के Ministry of Social Justice से लिया गया है।pib

और असली बात यह है — भांग कैनबिस का सिर्फ एक रूप है। गांजा और चरस, जिनकी लोगों को सच में लत लगती है, बिल्कुल अलग और ज्यादा खतरनाक चीज़ हैं। और आजकल जो माल मिल रहा है? उसमें मिलावट बहुत होती है, उसकी ताकत का अंदाज़ा नहीं लगता, और वह पहले से ज्यादा खतरनाक है।pmc.ncbi.nlm.nih

यह किसी को अच्छा-बुरा कहने की बात नहीं है। यह साफ, भरोसेमंद और भारत से जुड़ी सच्ची जानकारी की बात है — जो ज़्यादातर हेल्थ वेबसाइट्स नहीं बतातीं। HiGoodHealth में हमारा मकसद यही है: गलतफहमियाँ तोड़ना, बेकार की बातों से अलग सच सामने रखना, और ऐसी जानकारी देना जो आपको या आपके किसी अपने को बचा सके।

भांग के बारे में जो बात लोग नहीं बताते

3,000 साल पुराना रिश्ता — और अब यह इतना उलझा हुआ क्यों हो गया

कैनबिस की जड़ें भारतीय सभ्यता में बहुत गहरी हैं। अथर्ववेद (लगभग 1500 BCE) में भांग को पांच पवित्र पौधों में गिना गया है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उपयोग दर्द, पाचन की दिक्कत और बुखार तक में बताया गया है। साधु-संत भी सदियों से चरस का इस्तेमाल आध्यात्मिक साधना के हिस्से के रूप में करते रहे हैं। pmc.ncbi.nlm.nih

यही सांस्कृतिक अपनापन आज की स्थिति को और खतरनाक बनाता है। हम मान लेते हैं कि हम इस पौधे को जानते हैं। लेकिन सच यह है कि हम नहीं जानते।

आज के गैर-कानूनी बाज़ार में बिकने वाले बिना नियंत्रण वाले गांजा और चरस का रूप पुराने ग्रंथों में बताए गए पारंपरिक रूप से लगभग बिल्कुल अलग है। Frontiers in Pharmacology में छपी 2026 की एक अहम स्टडी में बताया गया कि भारत के ऐसे अनियंत्रित बाज़ार के उत्पादों में “ताकत का भरोसा नहीं, कीटनाशकों की मिलावट और दूसरी मिलावटें” आम हैं — यानी सही मात्रा समझना लगभग नामुमकिन हो जाता है, और नियंत्रित रिसर्च से मिली मेडिकल जानकारी भारतीय इस्तेमाल करने वालों पर ठीक से लागू ही नहीं होती। pmc.ncbi.nlm.nih

रिसर्चर Muzafar Riyaz ने 2026 के इस पेपर में लिखा: “भारत जैसे प्रतिबंध वाले बाज़ारों में यह फर्क सबसे ज्यादा खतरनाक बन जाता है, जहां लोगों को रोज़-रोज़ बदलती क्वालिटी, मिलावट और मात्रा की पूरी गड़बड़ी का सामना करना पड़ता है।”pmc.ncbi.nlm.nih

कानून सच में क्या कहता है (अधिकतर लोग यह बात गलत समझते हैं)

इस मामले में Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act, 1985 लागू होता है। आसान भाषा में समझिए:lawbhoomi

  • गांजा (फूल वाले हिस्से और धूम्रपान में इस्तेमाल होने वाली पत्तियाँ) — गैर-कानूनी
  • चरस (रेज़िन / हशीश) — गैर-कानूनी
  • भांग (पत्तियों और बीजों से बनाई जाती है, पीने या खाने में इस्तेमाल होती है) — अधिकतर राज्यों में कानूनी, लेकिन राज्य के नियमों के अनुसार

इसका मतलब यह है कि भारत के किसी भी शहर में आप जॉइंट जलाते हैं या चरस खरीदते हैं, तो आप कानून तोड़ रहे हैं, चाहे आसपास लोगों को यह कितना भी आम क्यों न लगता हो। फिर भी 1.3 करोड़ भारतीय नियमित रूप से गांजा और चरस का इस्तेमाल करते हैं, और ज़्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं कि कानूनी छूट सिर्फ भांग को मिलती है — वह भी हर राज्य में अलग हो सकती है।

दिमाग पर हमला: 2025–2026 की रिसर्च क्या बता रही है

चरस की महफ़िलों में आमतौर पर इस हिस्से की बात नहीं होती।

JAMA Psychiatry में बताई गई 2026 की एक बहुत बड़ी स्टडी, जिसमें 4.6 लाख किशोरों को ट्रैक किया गया, यह दिखाती है कि कैनबिस इस्तेमाल करने वाले किशोरों में बिना इस्तेमाल करने वालों की तुलना में बाइपोलर डिसऑर्डर और साइकोटिक दिक्कतें जैसे स्किज़ोफ्रेनिया होने का खतरा दोगुना था। डिप्रेशन का खतरा 33% और एंग्जायटी का खतरा 25% बढ़ा मिला। npr

भारत में यह बात और भी ज्यादा गंभीर है। 2024 की एक क्लिनिकल स्टडी में पाया गया कि कैनबिस पर निर्भर भारतीय मरीजों में साइकोटिक लक्षण काफी अधिक मिले, और कैनबिस डिपेंडेंस सिंड्रोम को “साइकोटिक बीमारियों के लिए खास तौर पर हाई-रिस्क ग्रुप” बताया गया।journals.indexcopernicus

भारत की प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य संस्था NIMHANS के मनोचिकित्सकों ने लंबे समय तक भांग लेने वालों में स्किज़ोफ्रेनिया जैसे साइकोसिस के मामले दर्ज किए हैं। डॉ. V.R. Thacore के भारतीय क्लिनिकल मामलों में ऐसे लोगों में सोचने-समझने और महसूस करने की गड़बड़ियाँ बताई गईं, जिनका पहले कोई मानसिक बीमारी का इतिहास नहीं था। Bhang psychosis

दिमाग पर हमला: 2025--2026 की रिसर्च क्या बता रही है

🧠 क्या आप जानना चाहते हैं कि आपका पेट और आपका मन आपस में कैसे जुड़े हैं? हमारा यह विस्तार से लिखा गया लेख पढ़ें: आपकी “गट फीलिंग” सच है: पेट और दिमाग के रिश्ते के पीछे का विज्ञान 

युवा लोगों में खतरा सबसे ज्यादा क्यों है:

  • इंसान का दिमाग लगभग 25 साल की उम्र तक विकसित होता रहता है
  • THC एंडोकैनबिनॉइड सिस्टम (Endocannabinoid System) को बिगाड़ता है, जो सीखने, याददाश्त और भावनाओं को संभालने में मदद करता है
  • 25 साल की उम्र से पहले रोज़ इस्तेमाल करने से दिमाग की बनावट में स्थायी बदलाव हो सकते हैं — यह सिर्फ थोड़ी देर की गड़बड़ी नहीं है
  • भारत में 18–25 साल की उम्र का समूह कैनबिस इस्तेमाल करने वाला सबसे तेजी से बढ़ता हुआ समूह है, खासकर बड़े शहरों और प्रतियोगी कोचिंग सेंटरों में [pmc.ncbi.nlm.nih]

आपका दिल भी इसे पसंद नहीं करता

चाहे होली की भांग वाली लस्सी हो या हॉस्टल के कमरे में चरस की चिलम, आपके दिल और खून की नलियों पर दबाव लगभग एक जैसा पड़ता है।

THC खून की नलियों को फैलाता है (वासोडाइलेशन / Vasodilation), जिससे ब्लड प्रेशर गिर सकता है। इसके जवाब में दिल तेज धड़कने लगता है — कभी-कभी सामान्य रफ्तार से दोगुना तक। healthshots

दिल्ली के डॉक्टर Dr. Alok Chopra के अनुसार, भांग लेने से दिल की धड़कन तेज हो सकती है, पैनिक अटैक आ सकते हैं, शक-भरी सोच बढ़ सकती है, और समझ-बूझ पर बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने साफ कहा: “भांग त्योहार की परंपरा का हिस्सा हो सकती है — लेकिन परंपरा का मतलब यह नहीं कि वह नुकसान नहीं करेगी।”ndtv

किन लोगों को भांग सहित कैनबिस के हर रूप से दूर रहना चाहिए: ndtv

  • जिन लोगों को दिल की बीमारी है या हाई ब्लड प्रेशर है
  • जिन्हें एंग्जायटी, डिप्रेशन या कोई भी मानसिक बीमारी है
  • जो लोग मानसिक बीमारी की दवाइयाँ ले रहे हैं (जैसे फ्लूऑक्सेटीन जैसी SSRIs, जिन पर लिवर एंज़ाइम का असर पड़ सकता है)
  • गर्भवती या बच्चे को दूध पिलाने वाली महिलाएँ
  • 25 साल से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति

वह लत जिसे भारत में बहुत लोग मानते ही नहीं

इस लेख की सबसे असहज लेकिन जरूरी सच्चाई यह है: कैनबिस की लत लगती है — और 25 लाख भारतीय पहले से इस पर निर्भर हैं।nams-annals

मेडिकल भाषा में इसे Cannabis Use Disorder (CUD) कहा जाता है। यह कोई कमजोरी नहीं है। यह दिमाग से जुड़ी ऐसी हालत है जिसमें THC धीरे-धीरे दिमाग के डोपामिन रिवॉर्ड सिस्टम पर कब्जा करने लगता है।

“नींद और भूख” टेस्ट — एक बार ईमानदारी से सोचिए:

  • क्या आप बिना गांजा, चरस या भांग लिए आराम से सो पाते हैं?
  • क्या आप बिना इसे लिए खाना अच्छे से खा पाते हैं?
  • क्या एक-दो दिन इस्तेमाल न करने पर चिड़चिड़ापन, घबराहट या ध्यान न लगने जैसी दिक्कत होती है?

अगर इनमें से दो या उससे ज्यादा सवालों का जवाब हाँ है, तो मुमकिन है कि आपके शरीर में निर्भरता बन चुकी हो।

रोज़ इस्तेमाल करने वालों में जिंदगी भर में लत लगने का खतरा 25–50% तक हो सकता है। और भारत की हालत को और मुश्किल बनाती है यह बात कि यहाँ नशे से जुड़ी बीमारियों में इलाज का गैप 73% है — यानी जिन 4 लोगों को मदद चाहिए, उनमें से लगभग 3 को मदद मिल ही नहीं पाती।nams-annals

💊 अगर आप या आपका कोई अपना नशे से जुड़ी मुश्किलों से जूझ रहा है, तो हमारा यह ब्लॉग भी काम आ सकता है: Managing Anxiety and Stress: A Complete Guide

हर बिना नियंत्रण वाले पैकेट में छिपा खतरा

भारत में कैनबिस की दिक्कत कानूनी बाज़ारों की तुलना में इसलिए और खतरनाक है, क्योंकि आपको यह पता ही नहीं होता कि आप असल में क्या ले रहे हैं।

Frontiers in Pharmacology में 2026 के एक रिसर्च पेपर ने साफ कहा कि भारत में गैर-कानूनी कैनबिस उत्पादों में अक्सर मिलावट होती है और उनमें कीटनाशक, भारी धातुएँ और दूसरी चीज़ें मिली हो सकती हैं — और इन सब पर ज़ीरो क्वालिटी कंट्रोल होता है। किसी लाइसेंस वाली फार्मेसी की तरह यहाँ न तो Certificate of Analysis (COA) होता है, न तय ताकत, न सुरक्षा की जाँच।pmc.ncbi.nlm.nih

शहरी इलाकों में घटिया क्वालिटी वाले माल में अक्सर nitrobenzene (जूते की पॉलिश में इस्तेमाल होने वाला केमिकल), डिटर्जेंट या पिसी हुई benzodiazepines जैसी चीज़ें मिलाई जाती हैं, ताकि उसका रंग-रूप या असर ज्यादा लगे। खेती से बचे जहरीले अंश और ऐसे खतरनाक केमिकल मिलकर इस्तेमाल करने वालों के लिए बड़ा खतरा बना देते हैं। vice

चरस की एक खेप में 5% THC हो सकता है। उसी सप्लायर की अगली खेप में 30% तक हो सकता है। मात्रा की यही गड़बड़ी वजह है कि भारत के इमरजेंसी वार्ड में ऐसे लोग बढ़ रहे हैं जिन्हें अचानक गंभीर दिक्कत हो जाती है — जरूरी नहीं कि उन्होंने ज्यादा लिया हो, कई बार माल ही बिना बताए बदल गया होता है।

भारत के संदर्भ में खास तौर पर ज्यादा खतरनाक चीज़ें:

  • बिना भरोसे वाले स्रोत से खरीदी गई काले बाज़ार की चरस
  • मेलों और त्योहारों में बिना लाइसेंस वाले विक्रेताओं की बनाई भांग
  • कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों के पास बिकने वाले सिंथेटिक “हर्बल” प्रोडक्ट
  • तंबाकू के साथ मिलाकर लिया गया कैनबिस (भारत में बहुत आम) — इससे लत और फेफड़ों के नुकसान का खतरा दोगुना हो जाता है

नशे का नया तरीका: भारत में कैनबिस वेपिंग का बढ़ता चलन

भारत में cannabis vape market तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2030 तक इसका राजस्व लगभग $395.1 million तक पहुँच सकता है, और 2025 के बाद इसमें करीब 16.8% से 16.9% की सालाना बढ़त (CAGR) देखी जा सकती है। भांग जैसे पारंपरिक तरीके अभी भी सांस्कृतिक रूप से मौजूद हैं, लेकिन बड़े शहरों में “portable” वेपिंग डिवाइस तेज़ी से बढ़ रहे हैं। 2024 में इसी हिस्से की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रही, और 2030 तक इसके सबसे तेज़ बढ़ने की उम्मीद है। इस बदलाव की एक वजह यह मानी जाती है कि वेपिंग, धूम्रपान की तुलना में ज्यादा “छुपाकर” की जा सकती है, और युवाओं में flavored व अपनी पसंद के हिसाब से बदले जा सकने वाले प्रोडक्ट की मांग भी बढ़ रही है।

हालाँकि वेपिंग को अक्सर “कम नुकसान वाली” चीज़ की तरह बेचा जाता है, लेकिन मेडिकल रिसर्च भारत के संदर्भ में इसके बड़े खतरे दिखाती है, खासकर इसलिए क्योंकि गैर-कानूनी बाज़ार में इस पर कोई सही निगरानी नहीं है। 2026 के उभरते डेटा के मुताबिक, वेपिंग कुछ जलने से बनने वाले जहरीले पदार्थों का असर कम कर सकती है, लेकिन इसके अपने अलग खतरे हैं, जैसे e-cigarette या vaping-associated lung injury (EVALI) और सांस से जुड़ी परेशानियों का बढ़ा हुआ जोखिम। इसके अलावा, vape pens में इस्तेमाल होने वाले ज्यादा ताकत वाले concentrate में अक्सर पारंपरिक पत्तियों वाले कैनबिस से ज्यादा THC होता है, जिससे घबराहट, साइकोसिस और दूसरे अचानक होने वाले बुरे असर बढ़ सकते हैं। भारत के बिना नियंत्रण वाले बाज़ार में एक और बड़ी दिक्कत “toxicological data gap” की है, यानी सड़क पर बिकने वाले कई oils में heavy metals या synthetic cannabinoids जैसी खतरनाक मिलावटें हो सकती हैं, जो खतरे को और बढ़ा देती हैं।

कहाँ-कहाँ कैनबिस का सच में मेडिकल उपयोग है (सच और बढ़ा-चढ़ाकर कही बातों में फर्क)

न्याय की बात करें तो कैनबिस पूरी तरह बुरी चीज़ नहीं है। साइंस कुछ असली मेडिकल उपयोग जरूर दिखाती है — लेकिन वे उतने बड़े और हर जगह लागू नहीं हैं जितना वेलनेस इंडस्ट्री दावा करती है।

जहाँ उपयोग के पक्ष में सबूत हैं:

  • नसों से जुड़ा पुराना दर्द — कुछ स्टडी में असर opioids के बराबर पाया गया है
  • कीमोथेरेपी से होने वाली उल्टी और मितली — इसके लिए pharmaceutical cannabinoids जैसे Dronabinol दिए जाते हैं
  • बचपन की मिर्गी — CBD-based Epidiolex को गंभीर दौरे वाली बीमारियों के लिए FDA की मंजूरी मिली है
  • Multiple sclerosis में मांसपेशियों के ऐंठन

इनके लिए पक्का सबूत नहीं है, चाहे Instagram पर कुछ भी दिखे:

  • एंग्जायटी (नियमित इस्तेमाल से कई बार बढ़ जाती है)
  • डिप्रेशन (एंटीडिप्रेसेंट दवाइयों के असर में दखल दे सकती है)
  • सामान्य इम्युनिटी या “वेलनेस”
  • लंबे समय की नींद की दिक्कत (शरीर जल्दी आदी हो जाता है और नींद की क्वालिटी और बिगड़ सकती है)
नशे का नया तरीका: भारत में कैनबिस वेपिंग का बढ़ता चलन

नई वैज्ञानिक स्टडीज़: आसान भाषा में

Study

What It Found

Why It Matters for India

JAMA Psychiatry, 2026 (460,000 teens tracked)

Adolescent cannabis use doubles psychosis and bipolar disorder risk npr{(https://www.npr.org/2026/02/21/nx-s1-5719338/cannabis-marijuana-weed-teens-psychosis-jama)

India’s youth bulge — 600 million under 25 — makes this critical

Frontiers in Pharmacology, 2026 (India-specific)

Illicit Indian products have “dosing chaos” and toxicological data gaps pmc.ncbi.nlm.nih

Indian users face risks clinical trials don’t even measure

NAMS Task Force Report, 2024

72 lakh Indian problem users; 73% treatment gap nams-annals (https://nams-annals.in/nams-task-force-report-alcohol-substance-use-disorders-and-behavioral-addictions-in-india/)

A public health emergency hiding in plain sight

Indian Journal of Health & Wellness, 2024

Cannabis dependence is a “high-risk group” for psychosis in India journals.indexcopernicus

Even “low content” cannabis correlates with psychotic symptoms

नुकसान कम करने के तरीके: अगर आप या आपका कोई परिचित कैनबिस लेता है

भारत में रोक लगाने से कैनबिस का इस्तेमाल बंद नहीं हुआ है — और शायद पूरी तरह बंद होगा भी नहीं। इसलिए सुरक्षित रहने के लिए कुछ काम की, सबूतों पर आधारित बातें यहाँ दी जा रही हैं:

  1. 25 साल की उम्र के बाद तक इंतज़ार करें — दिमाग की सुरक्षा के लिए यह बहुत जरूरी है
  2. इसे कभी तंबाकू के साथ न मिलाएँ — भारत में यह सबसे आम और सबसे खतरनाक आदत है
  3. चरस और बहुत तेज असर वाले प्रोडक्ट से बचें — अगर बिल्कुल ही लेना हो, तो कम जोखिम वाले रूप चुनें
  4. अगर आपको पहले से मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कत रही है या परिवार में साइकोसिस या स्किज़ोफ्रेनिया का इतिहास है, तो बिल्कुल न लें
  5. नशे के बाद गाड़ी न चलाएँ — असर कम से कम 3–4 घंटे रह सकता है; खाने वाली चीज़ों में यह 8 घंटे तक जा सकता है
  6. अगर आप कोई दवा ले रहे हैं तो होली पर भी इससे बचें — खासकर एंटीडिप्रेसेंट, खून पतला करने वाली दवाइयाँ या दौरे की दवाइयाँ
  7. गर्भावस्था या बच्चे को दूध पिलाने के दौरान कभी इस्तेमाल न करें — THC प्लेसेंटा को पार कर सकता है और माँ के दूध में भी पहुँच सकता हैhindustantimes
  8. मनोचिकित्सक से सच-सच बात करें — भारत में बहुत से डॉक्टर कैनबिस काउंसलिंग में खास ट्रेनिंग नहीं रखते; ऐसे में psychiatrist सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है

मुख्य बातें

  • परंपरा और आज का प्रोडक्ट एक चीज़ नहीं हैं। पुरानी आदत नए ख़तरे की सुरक्षा नहीं देती।
  • उम्र जितनी कम, जोखिम उतना ज़्यादा — यही रिसर्च की सबसे लगातार दोहराई जाने वाली बात है।
  • लत असली है, चाहे आसपास के लोग इसे मानें या न मानें।
  • नींद और भूख में आया बदलाव सबसे पहला ईमानदार संकेत होता है। उसे नज़रअंदाज़ न करें।
  • मदद माँगना कमज़ोरी नहीं है। लेख में भारत में उपलब्ध मदद के रास्ते दिए गए हैं।

चेतावनी के संकेत: कब मदद लेनी चाहिए

अपने आप से ईमानदारी से पूछिए — क्या आपके साथ इनमें से कुछ हुआ है?

  • जितना सोचा था उससे ज्यादा, और जितनी बार सोचा था उससे ज्यादा इस्तेमाल करना
  • कम करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए
  • बिना लिए मन बुझा-बुझा रहना, कुछ करने का मन न होना, या खुशी महसूस न होना (Anhedonia)
  • रिश्तों, काम या पढ़ाई में इस्तेमाल की वजह से दिक्कत आना
  • कैनबिस जुटाने में बहुत समय या पैसा लगना
  • बंद करने पर शारीरिक दिक्कत होना — नींद न आना, चिड़चिड़ापन, भूख कम लगना

अगर 2 या उससे ज्यादा जवाब हाँ हैं, तो Cannabis Use Disorder होने की संभावना है। कृपया पेशेवर मदद लें।

भारत में मदद कहाँ मिलेगी

Resource

Contact

NIMHANS Centre for Addiction Medicine (CAM), Bangalore

+91-80-46110007 cam.nimhans (https://cam.nimhans.ac.in/)

AIIMS NDDTC, New Delhi

011-26593677

iCall (TISS)

9152987821

Vandrevala Foundation

1860-2662-345 (24/7, free)

SAMHSA (for NRIs in the US)

1-800-662-4357

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
  1. क्या भारत में भांग कानूनी है?
    भांग अधिकतर भारतीय राज्यों में राज्य के एक्साइज नियमों के तहत कानूनी मानी जाती है, क्योंकि यह कैनबिस की पत्तियों और बीजों से बनती है — न कि प्रतिबंधित फूल वाले हिस्सों से। लेकिन NDPS Act, 1985 के तहत गांजा और चरस अब भी गैर-कानूनी हैं।lawbhoomi
  2. क्या होली पर ली गई भांग से सेहत की दिक्कत हो सकती है?
    हाँ। एक बार ली गई भांग भी दिल की धड़कन तेज कर सकती है, पैनिक अटैक ला सकती है, शक-भरी सोच बढ़ा सकती है और समझने की क्षमता बिगाड़ सकती है — खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से बीमारी है, जो दवाइयाँ ले रहे हैं, या जिनकी उम्र 25 साल से कम है।ndtv
  3. क्या कैनबिस से भारतीयों में मानसिक बीमारी हो सकती है?
    भारतीय क्लिनिकल रिसर्च और दुनिया भर की स्टडीज़ दोनों इस बात का मजबूत संबंध दिखाती हैं। खासकर कम उम्र में या ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करने पर कैनबिस से साइकोसिस, स्किज़ोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर और एंग्जायटी का खतरा बढ़ जाता है।
  4. कैनबिस शरीर में कितने समय तक रहती है?
    एक बार इस्तेमाल: 1–3 दिन। मध्यम इस्तेमाल: 5–7 दिन। रोज़ाना ज्यादा इस्तेमाल: 10–30+ दिन, क्योंकि THC शरीर की चर्बी में जमा हो सकता है।
  5. क्या कैनबिस वेप करना, धूम्रपान से सुरक्षित है?
    नहीं। वेपिंग में अक्सर ज्यादा मात्रा में THC जाता है, और इसमें मिलावट वाले oils या additives भी हो सकते हैं, जिससे दिमागी असर और फेफड़ों के नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
  6. Cannabis Use Disorder क्या है? क्या मुझे लत है?
    अगर आप बिना कैनबिस के आराम से सो या खा नहीं पाते, बंद करने पर चिड़चिड़ापन होता है, या छोड़ने की कोशिश करके भी नहीं छोड़ पाए — तो ये CUD के संकेत हो सकते हैं। नियमित इस्तेमाल करने वालों में लगभग 30% लोगों में यह हालत बन सकती है।
  7. क्या कैनबिस मेरी दवाइयों के साथ रिएक्ट कर सकती है?
    हाँ। कैनबिस CYP450 नाम के लिवर एंज़ाइम सिस्टम को प्रभावित कर सकती है, जो बहुत सी दवाइयों को शरीर में तोड़ने का काम करता है। इससे fluoxetine या sertraline जैसी एंटीडिप्रेसेंट दवाओं, blood thinners और anti-seizure drugs का असर बदल सकता है। कुछ मामलों में Warfarin जैसी दवाओं या दिल की कुछ दवाइयों की मात्रा खून में खतरनाक रूप से बढ़ भी सकती है। इसलिए अपने डॉक्टर को हमेशा सच बताइए।
  8. किन लोगों को किसी भी रूप में कैनबिस बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए?
    गर्भवती महिलाएँ, बच्चे को दूध पिलाने वाली माताएँ, 25 साल से कम उम्र के लोग, दिल की बीमारी वाले, एंग्जायटी, डिप्रेशन या किसी भी मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग, और मानसिक बीमारी की दवा लेने वाले लोग।ndtv

शब्दावली

  • THC (Tetrahydrocannabinol): The primary psychoactive compound in cannabis responsible for the “high”
  • CBD (Cannabidiol): Non-psychoactive cannabis compound with some proven medical uses
  • CUD (Cannabis Use Disorder): A clinical diagnosis for cannabis addiction or dependency
  • NDPS Act: Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, India’s primary drug control law (1985)
  • CHS (Cannabis Hyperemesis Syndrome): Cyclical vomiting disorder caused by long-term cannabis use
  • NIMHANS: National Institute of Mental Health and Neuro Sciences, Bangalore — India’s premier psychiatric research centre
  • NDDTC: National Drug Dependence Treatment Centre, AIIMS New Delhi
  • Anhedonia: Inability to feel pleasure from activities previously enjoyed; common in cannabis dependence
  • CYP450: Liver enzyme system that metabolises most medicines; inhibited by cannabis
  • EVALI: E-cigarette or Vaping-Associated Lung Injury — a potentially fatal condition
  • Endocannabinoid System: The brain’s own cannabinoid receptor network, disrupted by external THC use

मुख्य बाहरी संदर्भ

  1. AIIMS/NDDTC — Magnitude of Substance Use in India (2019)
  2. NAMS Task Force Report on Substance Use Disorders in India (2024): nams-annals
  3. Riyaz, M. (2026). Toxicological Data Gap in India’s Cannabis Landscape. Frontiers in Pharmacology: pmc.ncbi.nlm.nih
  4. Di Forti et al. (2019). Cannabis use and risk of psychotic disorder. The Lancet Psychiatry.30048-3/fulltext)
  5. JAMA Psychiatry (2026) — Adolescent cannabis use and mental illness: npr
  6. Indian review of cannabis and co-occurring psychiatric disorders — IJMR: ijmr.org
  7. NIMHANS Centre for Addiction Medicine: cam.nimhans
  8. Cannabis in India — Historical and Current Research (PMC, 2022): pmc.ncbi.nlm.nih

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मेडिकल डिस्क्लेमर

यह लेख सिर्फ जानकारी देने के लिए है, यह मेडिकल सलाह नहीं है। कैनबिस से जुड़े कानून भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकते हैं। सिर्फ इस लेख के आधार पर नशे, दवाइयों या इलाज के बारे में फैसला न लें। अपनी सेहत के हिसाब से सलाह के लिए हमेशा किसी योग्य हेल्थकेयर प्रोफेशनल — बेहतर हो तो psychiatrist — से बात करें। अगर आप या आपका कोई परिचित तुरंत संकट में है, तो ऊपर दिए गए हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करें या नज़दीकी अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में जाएँ।

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Authors

  • डॉ. वसुंधरा, MDS (ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी), BDS

    ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन

    कार्य भूमिका: लेखक

    परिचय (Bio):
    डॉ. वसुंधरा एक अनुभवी ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन हैं जिन्हें दंत सर्जरी, ट्रॉमा मैनेजमेंट और क्रेनियोफेशियल प्रक्रियाओं का अनुभव है। उन्होंने कई जटिल दंत सर्जरी जैसे डेंटल इम्प्लांट, जबड़े की फ्रैक्चर सर्जरी, सिस्ट सर्जरी और अन्य उन्नत दंत प्रक्रियाओं पर काम किया है। वे ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी से संबंधित क्लिनिकल रिसर्च और वैज्ञानिक प्रकाशनों में भी सक्रिय रूप से शामिल हैं।

    विशेष कौशल:
    ओरल सर्जरी, डेंटल इम्प्लांट, मैक्सिलोफेशियल ट्रॉमा उपचार, सर्जिकल प्रक्रियाएँ, क्लिनिकल रिसर्च।

  • डॉ. सान्या अंसारी, MBBS, MS (ENT), MRCS (UK)

    ईएनटी सर्जन एवं क्लिनिकल रिसर्च योगदानकर्ता

    कार्य भूमिका: समीक्षक

    परिचय (Bio):
    डॉ. सान्या अंसारी एक लाइसेंस प्राप्त चिकित्सक हैं जो ईएनटी (कान, नाक और गला) तथा हेड एंड नेक सर्जरी में विशेषज्ञता रखती हैं। वे भारत और यूनाइटेड किंगडम दोनों में चिकित्सा अभ्यास के लिए पंजीकृत हैं। उन्हें ईएनटी रोगों के निदान, सर्जिकल उपचार, आपातकालीन वायुमार्ग देखभाल और रोगी-केंद्रित उपचार योजना का अनुभव है। वे अकादमिक शिक्षण और क्लिनिकल रिसर्च में भी सक्रिय रूप से योगदान देती हैं।

    विशेष कौशल:
    ईएनटी सर्जरी, क्लिनिकल निदान, सर्जिकल प्रक्रियाएँ, प्रमाण आधारित उपचार योजना, मेडिकल रिसर्च।

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